अरावली, जंगल, बाजार और मैं

अरावली पर्वत

अरावली, जंगल, बाजार और मैं


अरावली
सिर्फ पहाड़ नहीं है,
यह समय की रीढ़ है,
जो थामे खड़ी है
रेगिस्तान की
बढ़ती हुई लालसा को।


जब अरावली कटती है
तो पत्थर नहीं गिरते,
भविष्य दरकता है,
पीढ़ियों की प्यास
ज़मीन के भीतर
सूख जाती है।


जंगल
पेड़ों की गिनती नहीं,
धरती के फेफड़े हैं,
जहाँ हवा
संस्कार लेकर निकलती है,
और जीवन
संतुलन सीखता है।


एक पेड़ गिरता है
तो एक छाया मरती है,
एक चिड़िया
अपना पता भूल जाती है,
और एक बच्चा
भविष्य की गर्मी से
अकेला लड़ने को
छोड़ दिया जाता है।


पर्यावरण
कोई नारा नहीं,
यह तो
धरती और मनुष्य के बीच
लिखा गया
जीवन का अनुबंध है,
जिसे हमने
मुनाफ़े की स्याही से
काट दिया है।


और मैं—
एक आदमी—
कहता हूँ
मुझे क्या लेना
अरावली से,
वह तो
कहीं दूर खड़ा
पत्थरों का ढेर है।


मुझे चाहिए
बड़ा घर,
चौड़ी सड़क,
हर मौसम में सुविधा,
और थोड़ी सी हरियाली
बस
बालकनी तक।


मैं पेड़ नहीं काटता,
मैं तो सिर्फ
घर बनवाता हूँ,
मॉल में घूमता हूँ,
गाड़ी चलाता हूँ,
और विकास की
तालियाँ बजाता हूँ।


पर हर ईंट
कहीं न कहीं
अरावली की छाती से
उखड़ी हुई होती है,
हर सड़क
किसी जंगल की
रीढ़ पर से
गुज़रती है।


मैं कहता हूँ—
एक आदमी क्या कर लेगा?
पर यही एक आदमी
हर दिन
सैकड़ों फैसले करता है—
ज़रूरत या लालच,
संयम या भोग,
आज या कल।


मैं चाहता हूँ
सस्ती चीज़ें,
पर नहीं पूछता
कि वे सस्ती
किसकी कीमत पर हैं।
मैं चाहता हूँ
खनन से निकला पत्थर,
पर नहीं देखता
कि अरावली
नंगी हो रही है।


मैं चाहता हूँ
हर मौसम में आराम,
पर यह नहीं सोचता
कि मौसम
खुद
आईसीयू में है।
एक पेड़ कटता है
और मैं खुश होता हूँ—
अब व्यू साफ है।


मैं नहीं जानता
कि उसी के साथ
मेरी साँसों की उम्र
थोड़ी और
कम हो गई।
मैं शिकायत करता हूँ—
गर्मी बहुत है,
पानी नहीं है,
हवा ज़हरीली है,
पर आईना देखने का साहस
मेरे पास नहीं।


उद्योगपति
मेरी ज़रूरत से नहीं,
मेरे लालच से ताक़तवर होता है,
उसकी कमर
मेरे ही हाथों से
मज़बूत होती है।
उसकी कमर
हथियार से नहीं टूटेगी,
वह टूटेगी
मेरी आदतों से।


जब मैं
ज़रूरत से ज़्यादा नहीं लेता,
तो लालच की फैक्ट्रियाँ
अपने आप
धीमी पड़ जाती हैं।
कम खरीदो,
सोचकर खरीदो,
स्थानीय को चुनो—
यही सबसे
शांत
और सबसे
खतरनाक विरोध है।


हर वह चीज़
जिसके बिना
काम चल सकता है,
उसे छोड़ देना
सबसे बड़ी
क्रांति है।
हम उपभोक्ता हैं,
कमज़ोर नहीं—
हमारी पसंद
बाज़ार की दिशा तय करती है।


जब हम
भोग कम करते हैं,
तो मुनाफ़े की कमर
अपने आप
झुकने लगती है।
अरावली
मुझसे रोज़ कहती है—
मैं टूटी
तो तू डूबेगा।


जंगल
मुझसे सवाल करते हैं—
तू सिर्फ लेता रहेगा
या लौटाएगा भी?
पर्यावरण
मुझसे लड़ता नहीं,
बस धीरे-धीरे
मुझे
मेरे भोग का
हिसाब थमा देता है।


अब सवाल यह नहीं
कि अरावली बचेगी या नहीं,
जंगल रहेगा या नहीं,
सवाल यह है—
मैं बदलूँगा
या नहीं।
क्योंकि
जब एक-एक आदमी
अपनी भूख को
सीमा देगा,
तभी
अरावली खड़ी रहेगी,
जंगल साँस ले पाएगा,
पर्यावरण बचेगा—
और मनुष्य
भी।

Manibhai Navratna

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