तुम लेखक नहीं नर पिचास हो
हिंदी कवितातुम लेखक नहीं नर पिचास हो सिर्फ तुम ही नहींतुम से पूर्व भी थीपूरी जमात भांडों की।जो करते रहे ताथाथैयादरबारों की धुन पर।चाटते रहे पत्तलसियासी दस्तरखान पर।हिलाते रहे दुमसियासी इशारों पर।चंद रियायतों के लिएचंद सम्मान-पत्रों के लिए।करते रहे कत्लजनभावनाओं का।करते रहे अनसुनाकरुण चीखों को।करते रहे नजर अंदाजअंतिम पायदान केव्यक्ति की पीड़ा।तुम लेखक नहींनर पिचास हो।
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