बहुरूपियाBy कविता बहार / हिंदी कविता बहुरूपिया बकरी बनकर आया,मेमने को लगाकर सीने से,प्यार किया,दुलार किया!दूसरे ही क्षण–भक्षण कर मेमने का,तृप्त हो डकारा,बहुरूपिये भेड़िये ने फिर,अपना मुखौटा उतारा!!—-डॉ. पुष्पा सिंह’प्रेरणा’अम्बिकापुर,सरगुजा(छ. ग.)📢 इस पोस्ट को अपने दोस्तों के साथ शेयर करें: 📲 WhatsApp ✈ Telegram 📘 Facebook Related Posts ज़िंदगी की राह/ निमाई प्रधान’क्षितिज अरुणोदय नया संसार बसायेंगे अब तरूणों को आना होगा हम परिन्दे नयी सुबह पर कविता