“धर्मनिरपेक्ष संविधान, धार्मिक भीड़” – मनीभाई नवरत्न
हिंदी कविता“धर्मनिरपेक्ष संविधान, धार्मिक भीड़” (एक सवाल की शक्ल में कविता) हमने क़सम खाई थीइक धरती की,जहाँ मज़हब से ऊपर होगी इंसानियत।पर मंदिर-मस्जिद की दीवारों ने ,सोचा नहीं थाघुटती संविधान की आहट? संविधान पे तो लिखा है —“सब धर्म समान”,पर ज़ुबानों पे क्योंनफ़रत के बयान?राज सत्ता हो निष्पक्ष,अगर यही है बात,पर जनता खुद बँटी हो,क्या फिर
“धर्मनिरपेक्ष संविधान, धार्मिक भीड़” – मनीभाई नवरत्न Read More »
