हिंदी कविता

मेरे वो कश्ती डुबाने चले है

हिंदी कविता

मेरे वो कश्ती डुबाने चले है रूठे महबूब को हम मनाने चले है |अपनी मजबूरीया उनकों सुनाने चले है | जो कहते थे तुम ही तुम हो जिंदगी मेरी  |बीच दरिया मेरे वो कश्ती डुबाने चले है | ख्यालो ख्याबों मेरी  सूरत उनका था दावा |डाल गैरो गले बाहे वो मुझको भुलाने चले है |

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मानवता की छाती छलनी हुई

हिंदी कविता

मानवता की छाती छलनी हुई विमल हास से अधर,नैन वंचित करुणा के जल से।नहीं निकलती पर पीड़ा की नदीहृदय के तल से।। सहमा-सहमा घर-आँगन है, सहमी धरती,भीत गगन है ।लगते हैं अब तो जन-जन क्यों जाने ?हमें विकल से । स्वार्थ शेष है संबंधों में, आडंबर है अनुबंधो में ।मानवता की छाती छलनी हुईमनुज के छल से । ——R.R.Sahuकविता

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कंगन की खनक समझे चूड़ी का संसार

नारी जीवन और संवेदना

कंगन की खनक समझे चूड़ी का संसार नारी की शोभा बढ़े, लगा बिंदिया माथ।कमर मटकती है कभी, लुभा रही है नाथ। कजरारी आँखें हुई,  काजल जैसी रात।सपनों में आकर कहे,  मुझसे मन की बात। कानों में है गूँजती, घंटी झुमकी साथ।गिर के खो जाए कहीं, लगा रही पल हाथ। हार मोतियों का बना, लुभाती गले

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धूल पर दोहे

नारी जीवन और संवेदना

धूल पर दोहे पाहन नारी हो गई,पाकर पावन धूलप्रभु श्रीराम करे कृपा,काँटे लगते फूल महिमा न्यारी धूल की,केंवट करे गुहारप्रभु पग धोने दीजिए,तभी चलूँ उस पार मातृभूमि की धूल भी,होता मलय समानबड़भागी वह नर सखी,त्यागे भू पर प्रान आँगन में सब खेलते,धूल धूसरित ग्वालमात यशोदा गोद ले,चुमती मोहन गाल कृष्ण पाद रज धो रहे,बहा नैन

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बस तेरा ही नाम पिता

हिंदी कविता

बस तेरा ही नाम पिता        उपर से गरम अंदर से नरम,ये वातानुकूलित इंसान है!पिता जिसे कहते है मित्रो,वह परिवार की शान है!! अच्छी,बुरी सभी बातो का,वो आभास कराते है!हार कभी ना मानो तुम तो,हर पल हमै बताते है!! वो नही है केवल पिता हमारे,अच्छे,सच्चे मित्र भी है!परिवार गुलशन महकाए,ऎसा ब्रंडेड ईत्र भी

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डाँ. आदेश कमार पंकज के दोहे

हिंदी कविता

डाँ. आदेश कमार पंकज के दोहे पाई पाई जोड़ के बना खूब धनवान । संस्कार नहीं जानता कैसा तू नादान ।। करता लूट खसोट है वा रे वा इन्सान । लालच में है घूमता बिगड़ गई सन्तान ।। क्यों तू लालच कर रहा करता फिरता पाप । सोने सा अनमोल तन बना रहा अभिशाप ।।

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सामाजिक बदलाव पर छत्तीसगढ़ी कविता

हिंदी कविता

सामाजिक बदलाव पर छत्तीसगढ़ी कविता करलई होगे संगी ,करलई होगे गा।छानी होगे ढलई ,करलई होगे गा ।।पहिली के माटी घर ,मोला एसी लागे।करसी के पानी म ,मोर पियास भागे।मंझन पहा दन, ताश अऊ कसाड़ी म।टेढ़ा फंसे रे ,   हमर बिरथा-बाड़ी म।ए जमाना बदलई ,  करलई होगे गा ।करलई होगे संगी ,   करलई होगे गा ॥

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17 मई विश्व दूरसंचार दिवस के अवसर पर एक कविता

विज्ञान, तकनीक और भविष्य

विश्व दूरसंचार दिवस १७ मई को मनाया जाता है। यह दिन 17 मई 1865 को अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ की स्थापना की स्मृति में विश्व दूरसंचार दिवस के रूप में जाना जाता था। वर्ष1973 में मैलेगा-टोर्रीमोलिनोन्स में एक सम्मेलन के दौरान इसे घोषित किया गया। इस दिन का मुख्य उद्देश्य इंटरनेट और नई प्रौद्योगिकियों द्वारा लाया गया सामाजिक परिवर्तनों की

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मानव समानता पर कविता

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मानव समानता पर कविता हम मानव मानव एक समान।हम सब मानव की संतान ।धर्म-कर्म भाषा भूषा से ,हमको ना किञ्चित् अभिमान ।हिंदू की जैसे वेद पुराण ।बस वैसे ही बाइबल और कुरान ।सब में छुपी हुई है एक ही ज्ञान।सभी बनाती है मनुष्य को महान।छोड़ दो करना लहूलुहान ।मानवता धर्म की कर पहचान ।धर्म जाति

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शादी से पहले

समाज और यथार्थ

शादी से पहले मैं जीना चाहता थाएकांत जीवन प्रकृति के सानिध्य में।पर न जाने कब उलझासेवा सत्कार आतिथ्य में ।अनचाहे  विरासत में मिलीदुनियादारी की बागडोर ।धीरे-धीरे जकड़ रही हैमुझे बिना किए शोर।कभी तौला नहीं थाअपना वजूद समाज के पलड़ों में ।अब जरूरी जान पड़ताकि पड़ूँ दुनियादारी के लफड़ों में ।सुख चैन मिलता सहजशादी से पहले

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विदाई के पल पर कविता

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विदाई के पल पर कविता वर्षों से जुड़े हुए कुछ पत्तेआज बसंत में टूट रहे हैं ।जरूरत ही जिनकी पेड़ मेंफिर भी नाता छूट रहे हैं। यह पत्ते होते तो बनती पेड़ की ताकत ।इन की छाया में मिलती सबको राहत ।पर सबको मंजिल तक जाना है।सबने बनाई है अपनी-अपनी चाहत ।इन की विदाई से

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आओ स्कूल चलें हम

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आओ स्कूल चलें हम आओ स्कूल चलें हम,स्कूल में खुब पढ़ें हम।जब तक सांसे चले,तब तक ना रुके कदम । पढ़ लिख के बन जाएं नेहरू।खुले गगन में उड़ेगें बन पखेरू।गाता रहे हमारी सांसो की सरगम।जैसे परी रानी की पायल की छम छम।आओ स्कूल चले हम …. आज इरादे हैं हमारे कच्चेकल पढ़कर हो जाएंगे

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