मेरे वो कश्ती डुबाने चले है
हिंदी कवितामेरे वो कश्ती डुबाने चले है रूठे महबूब को हम मनाने चले है |अपनी मजबूरीया उनकों सुनाने चले है | जो कहते थे तुम ही तुम हो जिंदगी मेरी |बीच दरिया मेरे वो कश्ती डुबाने चले है | ख्यालो ख्याबों मेरी सूरत उनका था दावा |डाल गैरो गले बाहे वो मुझको भुलाने चले है |
मेरे वो कश्ती डुबाने चले है Read More »


