डा० भीमराव अम्बेडकर – मनीभाई नवरत्न

डा० भीमराव अम्बेडकर

अत्यंत साधारण जीवन में जन्मा एक बालक,
जिसके पाँवों में जमी धूल भी
एक दिन भारतीय लोकतंत्र की नींव बनने वाली थी।

14 अप्रैल 1891 —
रत्नागिरि की उसी धरती पर,
जहाँ जाति की दीवारें
इंसान को इंसान होने नहीं देती थीं,
वहीं पैदा हुआ भीमराव,
जिसे दुनिया बाद में
‘बाबासाहेब’ कहकर प्रणाम करने वाली थी।

गरीबी, भेदभाव, उपेक्षा—
ये उनके बचपन के साथी थे,
पर मन में ज्ञान की लौ
कभी मंद न हुई।
एलफिंस्टन स्कूल की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए
उन्होंने जाना—
शिक्षा ही मुक्ति का मार्ग है।

विदेश की ओर बढ़ते उनके कदम
किसी एक जीवन का नहीं,
पूरे दलित समाज के
भविष्य का भार लेकर चले थे।
कोलंबिया विश्वविद्यालय में
ज्ञान का गंगा-प्रवाह बहा,
और उन्होंने दुनिया को दिखा दिया
कि प्रतिभा किसी जाति की गुलाम नहीं।

वापस लौटे तो संघर्ष और बड़ा था—
बड़ौदा के राजमहल से लेकर
सड़कों की धूल तक,
हर जगह उन्हें बताया गया
कि वे ‘अलग’ हैं।
पर वे रूके नहीं।
वे टूटे नहीं।
वे बदले—
और साथ में बदल दी
भारत की सोच।

‘बहिष्कृत हितकारिणी सभा’—
केवल एक संगठन नहीं,
एक क्रांति थी,
जो कह रही थी कि
मानव होने के अधिकार
किसी की दया से नहीं,
स्वयं संघर्ष से मिलते हैं।

स्वतंत्र भारत का सूर्योदय हुआ
तो उसके संविधान की रेखाएँ
उन्हीं की कलम से निकलकर
भविष्य की दिशा बन गईं।
भारतीय संविधान
केवल कानूनों का संग्रह नहीं,
एक वादा है—
समानता का, न्याय का,
और उस देश का
जो किसी भी नागरिक को
छोटा नहीं मानता।

पहले कानून मंत्री के रूप में
उन्होंने देश को कानून नहीं,
एक दृष्टि दी।
और फिर धर्म के प्रश्न पर
उन्होंने वही चुना
जहाँ मनुष्य–मनुष्य समान थे।
विजयदशमी, 1956—
उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया,
मानों कह रहे हों—
“मानवता ही मेरा धर्म है।”

6 दिसम्बर 1956—
शरीर भले चला गया,
पर मार्ग नहीं।
उनकी विचारधारा आज भी
उन हाथों में प्रकाश है
जो न्याय की खोज में हैं,
उन कदमों में शक्ति है
जो भेदभाव की दीवारें तोड़ना चाहते हैं।

डा० अम्बेडकर
केवल एक व्यक्ति नहीं,
एक चेतना हैं,
एक आंदोलन,
एक अपराजेय साहस
जो भारत की आत्मा में
सदैव जीवित रहेगा।

– मनीभाई नवरत्न

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