“एक ही चेहरा” — मनीभाई नवरत्न

🌓 “एक ही चेहरा” — मनीभाई नवरत्न

विश्वास —
एक नज़र है,
जो देखना नहीं चाहती,
सुनना भी नहीं,
जो अपने भीतर के मौन को
ईश्वर का उत्तर समझ बैठती है।

जब तू हाथ जोड़ता है,
तो ईश्वर मुस्कुराता है —
पर जब तू सवाल छोड़ देता है,
तो वही मुस्कान
डर में बदल जाती है।

धार में बहा दिया गया नारियल,
पूजा की थाली,
एक व्रत, एक कथा,
फिर कहा गया — “यह सब मत पूछो,
श्रद्धा है, श्रद्धा!”

पर श्रद्धा जब डर से बंधे,
जब कहे — “ऐसा नहीं किया, तो अनिष्ट होगा”,
तो वह विश्वास नहीं,
अंधविश्वास होता है —
जो तूने खुद रचा,
अपनी ही आँखें मूँद कर।

समाज ने सिखाया —
“औरत चूल्हे में अच्छी लगती है”,
“निचली जात है, छूना मत”,
“काली बिल्ली रास्ता काटे तो रुक जा!”
और तूने हँसने की बजाय
मान लिया, सिर झुका लिया।
क्योंकि तूने बचपन से यही देखा,
और देखा वही बन गया तेरा सच।

तेरे विश्वास ने
तेरे विवेक को बाँध लिया।
एक अदृश्य ज़ंजीर में —
जिसे तूने खुद ही पहना,
और अब उसे खोलने से डरता है।

फिर तू कहता है —
“मैं भाग्यहीन हूँ”,
“जो होता है, किस्मत से होता है।”
पर किसने सिखाया तुझे
कि तू अपनी दुनिया नहीं बदल सकता?

तूने जो हार मान ली,
जो डर को ‘नियति’ समझ लिया,
वही अंधविश्वास बन गया —
तेरे ही आत्मविश्वास का पत्थर।

विज्ञान ने कहा —
सब कुछ प्रमाण से चलता है।
पर जब तूने किताब में लिखा पढ़ लिया,
और सोचा “अब सोचने की ज़रूरत नहीं” —
तब तेरा वैज्ञानिक विश्वास भी
कट्टरता बन गया।
जहाँ नया विचार
हँसी बन गया,
और सवाल
“अव्यवहारिक”।

राजनीति में भी,
तू नारे लगाता है,
चेहरों की पूजा करता है,
नेताओं को देवता बना देता है,
और जब कोई सवाल पूछता है,
तो तू उसे गद्दार कह देता है।

क्या ये भी विश्वास नहीं है?
या अंधविश्वास का एक नया मुखौटा?

हर जगह,
हर कोने में,
तेरा विश्वास खड़ा है —
पर जब वह आँखें बंद करता है,
सवालों से डरता है,
तर्क को गालियाँ देता है —
तब वह
अंधविश्वास ही होता है।

मत बाँट इन्हें दो नामों में,
मत कह —
“ये तो श्रद्धा है”
या
“ये तो परंपरा है।”
क्योंकि जो बात सोच के बिना मानी जाए,
वह चाहे मंदिर में हो, संसद में हो,
या तेरे दिल के अंदर —
वह अंधा है।

और अंधा कुछ भी हो —
वह गिराता है।

तू अगर देख सके — तो देख,
समझ सके — तो समझ,
कि विश्वास और अंधविश्वास में फ़र्क सिर्फ़ उतना है,
जितना एक जलती आँख और बंद पलक में।

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