ग्रहों पर कविता

ग्रहों पर कविता

तुम जो हो जैसे हो
उतना ही होना तुम्हारे लिए पर्याप्त नहीं लग रहा हैं

तुम जो भी हो उसमें और ‘होने’ के लिए
कुछ लोगों को और भी जोड़ना चाहते हो
बहुत सारे या अनगिनत व्यक्तियों को अपने व्यक्तित्व में लाना चाहते हो
ताकि तुम अपने को साबित कर सको
इस फेर में असंख्य व्यक्तियों से भर गए हो तुम
और जिस दिन तुम्हें लगेगा
कि तुम अपने होने को याने नए वजूद को लगभग साबित करने वाले हो
तभी तुम्हें यह अहसास होगा
कि तुम वो बिलकुल भी नहीं हो जो साबित कर रहे हो।

तुम जैसे हो
उससे बिलकुल भी सन्तुष्ट नहीं हो
तुम हर पल वैसा होना चाहते हो जैसा हो नहीं
शायद तुम वैसा बन भी न पाओ जैसा बनना चाह रहे हो
वैसा बनने की यात्रा में तुम्हें अपनी कितनी सारी पहचाने
मिटाने भी पड़ेंगे
और जिस दिन तुम्हें लगेगा
कि जैसा बनना चाहते थे लगभग वैसा बनने ही वाले हो
तभी तुम्हें अहसास होगा
कि तुम बिलकुल भी वैसे नहीं हो जैसा बनना चाह रहे थे।

तुम पहले ही पर्याप्त थे
मग़र अपनी असंतुष्टि के दौड़ में
तुम वो नहीं रहे, तुम वैसे भी नहीं रहे
अब अपर्याप्तता की इस बिंदु पर दौड़ समाप्त हो चुकी है
पूर्णता की इस तलाश में समय भी निकल चुका है
तुम्हें अब आधे-अधूरे ही जीना होगा यह अभिशप्त जीवन।

नरेन्द्र कुमार कुलमित्र
9755852479

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