गुलाब पर कविता

गुलाब – गुल की आभा
मैं हूँ अलबेला गुलाब,
न झुकूँ चाहे आए सैलाब।
आँधी हो या तूफानी वार,
या तपता सूरज घमासान प्रहार।
काँटों को ओढ़े मैंने शृंगार,
संघर्ष ही बना मेरा आधार।
पूछो मुझसे पहचान का ज्ञान,
मुस्कान से पाता हूँ सम्मान।
चुभ जाऊँ यदि अनजाने में,
फिर भी चूमा जाऊँ दीवाने में।
दर्द में भी सौंदर्य समेटे,
मैं प्रेम की भाषा सदा बिखेरूँ।
हर उत्सव, हर शुभ अवसर पर,
सजता हूँ मैं गर्वित होकर।
यह ईश्वर की अनुपम दया,
जो मुझ पर बरसी हर घड़ी यहाँ।
मुरझाकर भी महक दे जाऊँ,
अपने अंत में अर्थ समझाऊँ।
क्षण-क्षण उपवन को महकाना,
मेरा धर्म, मेरा अफ़साना।
अपने नाम का अर्थ सुनाऊँ,
‘गुल’ से फूल, ‘आब’ से आभा बन जाऊँ।
इसी भाव में मैं हूँ पूर्ण,
मेरे बिना उपवन भी अपूर्ण।
हाँ, मैं ही हूँ अलबेला गुलाब,
फूलों का सरताज — बेमिसाल जनाब!

