श्रीमती इंदिरा गांधी -मनीभाई नवरत्न

श्रीमती इंदिरा गांधी -मनीभाई नवरत्न
(मौलिक, अतुकांत, संपूर्ण जीवन-गाथा समाहित कविता)


एक बच्ची—
जिसके जन्म पर सरोजिनी ने कहा था,
“तुम्हारे घर में भारत की नयी भावना ने जन्म लिया है”—
वह धीरे-धीरे
भारत की आत्मा में धड़कने लगी।

आनंद भवन की शांत गलियों में,
राजनीति की आहट
उसके खेल की धुन में घुली रही।
माँ कमला की बीमारी,
पिता नेहरू की दूर यात्राएँ—
उसे जल्दी बड़ा करने लगीं।

वह लड़की,
जिसने बारह वर्ष की उम्र में
‘वानर सेना’ खड़ी की,
जो संदेश ढोती थी
और स्वतंत्रता की आंच को सींचती थी—
वह स्वयं
अपने भीतर एक विशाल उद्देश्‍य को पलते देखती रही।

शांतिनिकेतन का कोमल स्पर्श,
ऑक्सफोर्ड की कठोर पढ़ाई,
और माँ को खोने की पीड़ा—
इन तीनों ने
उसकी संवेदना, साहस और दृष्टि को
एक साथ गढ़ा।

युद्ध छिड़ा—
और वह इंग्लैण्ड से लौट आई।
पिता ने उसे पत्र लिखकर
विश्व और मानवता का अर्थ सिखाया;
इन पत्रों में
उसके भविष्य का चेहरा आकार लेता रहा।

फिर विवाह हुआ—
फिरोज के साथ,
दो पुत्र—राजीव और संजय,
कांग्रेस का संघर्ष,
जेल की दीवारें,
और भीतर जलती राष्ट्र-चेतना;
वह जितनी बार गिरती,
उतनी बार नयी दृढ़ता से उठ खड़ी होती।

1947 के बाद
वह पिता की छाया बनकर खड़ी रही—
उनकी यात्राओं में,
उनके निर्णयों में,
उनके अंतरंग क्षणों में भी एक सहचर।
नेहरू के जाने पर
उसका हृदय टूट गया,
पर टूटे हुए हृदयों में ही
सबसे कठोर संकल्प जन्म लेते हैं।

सूचना मंत्री बनी,
फिर—
1966 में प्रधानमंत्री।
न इतिहास तैयार था,
न वह स्वयं—
पर समय जब चुनता है,
तो व्यक्ति को अपने आकार में ढाल ही लेता है।

बैंक राष्ट्रीयकरण,
गरीबी हटाओ,
ग्रामीण भारत का नये सिरे से सपना—
ये उसके हाथों से निकलकर
जनता की आँखों में चमकने लगे।

1971—
जब पाकिस्तान ने बम बरसाए,
तो उसने थरथराते राष्ट्र को
शांत स्वर में कहा—
हम पीछे नहीं हटेंगे।
तेरह दिनों में
एक नया देश जन्मा—
और दुनिया ने
भारत की नयी शक्ति को देखा।

पर हर शक्ति का अपना अँधेरा भी होता है।
आर्थिक संकट,
जनआंदोलन,
उनकी गलतियों और निर्णयों की कीमत—
और फिर आपातकाल।
उन्होंने स्वयं माना—
यह घाव था,
जो इतिहास ने दिया,
और जिसे उन्होंने स्वीकार किया।

हार मिली—
1977 में कठोर, कड़वी, अपमानजनक;
पर वे पर्वत थीं—
हिलती नहीं थीं।
चिकमंगलूर ने फिर बुलाया—
और जनता ने
उन्हें वापस सिंहासन की ओर धकेला।

1980 में
वे पुनः प्रधानमंत्री बनीं।
बीस सूत्रीय कार्यक्रम,
एशियाई खेल,
गुटनिरपेक्ष देशों का नेतृत्व,
अंतरिक्ष में भारत की उड़ान—
इन सब में
उनका आत्मविश्वास
पूरे राष्ट्र की धड़कन बन गया।

पर पंजाब—
एक घाव बनकर उठ खड़ा हुआ।
स्वर्ण मंदिर में छिपे हथियार,
टूटता सामाजिक संतुलन,
विखरता विश्वास—
और अंततः
एक कठोर निर्णय,
जिसकी कीमत
उन्हें अपने जीवन से चुकानी थी।

31 अक्टूबर 1984।
उनके घर में
अपने ही दो रक्षकों की गोलियों ने
एक इतिहास को रोक दिया।
एक दिन पहले ही
वे कह चुकी थीं—
“मेरे खून की आख़िरी बूंद भी
देश के काम आएगी।”

और वह सच हो गया।
वह चली गईं—
पर उनकी दृष्टि,
उनकी दृढ़ता,
उनकी निर्भीक राजनीति,
उनका स्त्री-संकल्प
आज भी देश की आत्मा में बहता है।

वह केवल प्रधानमंत्री नहीं थीं—
वह एक युग थीं,
एक ज्वाला,
एक चेतना,
एक ऐसी स्त्री—
जिसने भारत को
अपनी शक्ति का अर्थ समझाया।

उनकी कहानी समाप्त नहीं होती—
वह हर बार
भारत की इतिहास-पुस्तकों में नहीं,
भारत की धड़कनों में पढ़ी जाती है।

-मनीभाई नवरत्न

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