इंतज़ार आँखे में

इंतज़ार आँखे में

इंतज़ार करती है आँखे
हर उस शक्श की, 
जिसकी जेब भरी हो,
किस्मत मरी हो, लूट सके जिसे,
छल सके जिसे, 
इंतज़ार करती है आँखे।

इंतज़ार करती है आँखे
हर उस बीमार की, 
जो जूझ रहा है मर्ज में,
औंधे पड़ा है फर्श में, 
कर सके जिससे अपनी जेब गर्म,
लूट सके इलाज के बहाने, 
इंतज़ार करती है आँखे।

इंतज़ार करती है आँखे
हर उस मुजरिम की, 
जो आ चुका सलाखों के भीतर,
किया गुनाह, जज्बातो में आकर,
भोग रहा अपने अतीत को,
झपट सके जिससे वे लाखो।
इंतज़ार करती है आँखे।

ये सभी आ गए, आकर चले गए
मगर अफ़सोस वे क्यों नहीं आ रहे,
जो अबलाओं की अस्मत बचा सके,
सड़क किनारे भूखे बच्चों को रोटी खिला सके,
बुजुर्ग अपंग असहाय की सेवा कर सके।
जो नहीं आ रहे उनको इंतज़ार करती है ये आँखे….
इंतज़ार करती है ये आँखे।

रोहित शर्मा, छत्तीसगढ़
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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