जिज्ञासा – मनीभाई नवरत्न

अस्तित्व

जिज्ञासा / विज्ञान विषय पर कविता

(लंबी प्रेरक कविता)

जिज्ञासा—
मन के भीतर जन्म लेने वाली
वह छोटी-सी चिनगारी है
जो साधारण-से इंसान को
असाधारण बनने की राह दिखाती है।

यह एक प्रश्न से शुरू होती है—
“यह ऐसा क्यों है?”
और फिर
प्रश्नों की यह श्रृंखला
इतनी लंबी हो जाती है
कि एक दिन
वह पूरी दुनिया को बदल देती है।

जिज्ञासा ही तो है
जिसने आदिमानव को
पहली आग दिखाई,
पहला पहिया घुमाया,
पहला आसमान नापा।

यही वह शक्ति है
जो बच्चे को
तारे गिनना सिखाती है,
और वैज्ञानिक को
उनके रहस्यों में उतर जाने का
साहस देती है।

जिज्ञासा—
ज्ञान की वह चाबी है
जो हर बंद दरवाज़ा खोल देती है।
जो यह कहती है—
“जो दिखाई दे रहा है,
उससे आगे भी देखो।”

इसी के सहारे
न्यूटन ने गिरते सेब में
गुरुत्वाकर्षण का सत्य देखा,
आइंस्टीन ने समय का अर्थ बदला,
और अरस्तू से लेकर अब्दुल कलाम तक
असंभव को संभव कर दिखाया।

जिज्ञासा कभी
पुस्तक के पन्नों में जन्म नहीं लेती—
यह जन्म लेती है
मन के उन सवालों में
जो सुनने में छोटे लगते हैं,
पर अंदर से बहुत गहरे होते हैं।

कहते हैं—
जिस मन में जिज्ञासा है,
वह कभी बूढ़ा नहीं होता,

क्योंकि जिज्ञासा
सोच को जवान रखती है,
विचारों को ताज़ा रखती है,
और जीवन को
नए अर्थों से भर देती है।

जिज्ञासा हमें सिखाती है—
कि खोजने वाला
कभी हारता नहीं;
गिरते हुए भी वह
कुछ न कुछ सीख ही लेता है।

जिज्ञासा
सपनों के पंख बनकर
हमें उड़ना सिखाती है।
यह बताती है—
कि राहें स्वयं नहीं बनतीं,
उन्हें हम अपने
प्रश्नों और प्रयासों से बनाते हैं।

जब भी मन उलझ जाए,
मार्ग दिखाई न दे—
जिज्ञासा कहती है,
“एक नया प्रश्न पूछो,
उत्तर अपनी राह लेकर
तुम्हारे पास आएगा।”

यह वही ज्योति है
जिसने ऋषियों को तप कराया,
कवियों को शब्द दिए,
वैज्ञानिकों को प्रयोगशालाएँ दीं,
और यात्रियों को
नए महाद्वीप खोजने की प्रेरणा।

जिज्ञासा—
मनुष्य का वह सबसे स्वाभाविक संस्कार है
जो उसे ‘मनुष्य’ बनाता है।
यह न हो
तो सफलता रुक जाए,
विचार सूख जाएं,
और जीवन सिर्फ
एक दोहराई हुई कहानी बनकर रह जाए।

इसलिए
जो जिज्ञासु है
वही आगे बढ़ता है,
वही सीखता है,
वही दुनिया को नया आकार देता है।

आओ—
हम अपने भीतर की जिज्ञासा को
जगाए रखें,
संभाले रखें,
और उसे उड़ने दें—
क्योंकि जिज्ञासा
मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी है,
और उसी से शुरू होती है
हर महान यात्रा।

– मनीभाई नवरत्न

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