दूसरों को हराने से पहले
एक युद्ध भीतर लड़ा जाता है।
वहाँ न कोई तालियाँ होती हैं,
न कोई गवाह—
सिर्फ़ तुम
और तुम्हारी आदतें।
खुद को हराना
अपनी सुविधा को चुनौती देना है,
अपने अहंकार से
आँख मिलाना है।
यह जीत
किसी मंच पर नहीं चढ़ती,
यह चुपचाप
चरित्र में उतरती है।
जो अपने डर से भागता है
वह दूसरों को केवल दबा सकता है,
हरा नहीं सकता।
जो अपनी भूख को समझ लेता है,
वह लालच के खेल में
अजेय हो जाता है।
दूसरों पर विजय
अक्सर शोर करती है,
पर खुद पर विजय
शांत होती है।
वह तुम्हें
किसी से बड़ा नहीं,
किसी से बेहतर नहीं—
बस
अपने कल से
ज़रा सा आगे ले जाती है।
जब भीतर का शोर
थम जाता है,
तब बाहर की लड़ाइयाँ
अपने आप आसान हो जाती हैं।
क्योंकि
जिसने खुद को जीत लिया,
उसके लिए
दुनिया से जीत
सिर्फ़ परिणाम होती है,
लक्ष्य नहीं।





