कोरोना चालीसा पर कविता

कोरोना चालीसा पर कविता

कोरोना-वायरस || Corona Virus
कोरोना-वायरस पर कविता || Hindi Poem on Corona Virus

नर रसना के स्वाद का, कोरोना परिणाम।
चमगादड़ के सूप का, मचा हुआ कोहराम।।१।।

करता कोई एक है, भरता ये संसार।
घूम -घूम वो नर करें, व्याधि का संचार।।२।।

*चौपाइयाँ*

कैसे कटे दिवस हे भाई ।
लगता जीव लता मुरझाई।।१।।

संकट खड़ा करें हरजाई ।
कैसे इसकी हो भरपाई।।२।।

महा शाप ये इस सृष्टि का ।
दूर प्रभाव करो वृष्टि का।।३।।

जगत लगे निश्चेतन सारा ।
इसमे किसका दोष विचारा।।४।।

गुरुकुल देवालय सब खाली ।
चिंतित कृषक दग्ध हैं माली।।५।।

व्यापारी मजदूर भिखारी ।
सबके सम्मुख है लाचारी।।६।।

क्षमा दान प्रभु फिर से दीजै ।
आया कष्ट इसे हर लीजै।।७।।

टीबी कुष्ठ कैंसर तापा ।
सकल जगत कोरोना व्यापा।।८।।

लक्षण अगर नही पहचाने ।
मिलें वैद्य से उसकी माने।।९।।

तन का ताप यदि बढ़ जाये ।
साँस रुके समझो वो आये।।१०।।

सूखी खाँसी संग आ जाये ।
छोड़ विलम्ब जाँच करवायें।।११।।

लक्षण अनुकूल जो पायें ।
शीघ्र सुलभ उपचार करायें।।१२।।

व्यर्थ किसी भ्रम में ना रहना ।
हाथ जोड़ घर मे ही रहना।।१३।।

पुनि-पुनि कर मज्जन सब कीजौ।
मुँह पर मास्क लगा बच लीजौ।।१४।।

बीस मिनट की धूप सिकाई ।
इसमे सबसे बड़ी दवाई।।१५।।

जितना बने करें विश्रामा ।
साथ भजन कीजै श्री रामा।।१६।।

चौदह दिन एकांत निवासा ।
करें उपाय बचें यम पाशा।।१७।।

महा भयानक है ये व्याधि ।
कैसे इसको मिले समाधि।।१८।।

तज उपवास रोज है खाना ।
लौंग आँवला सौंठ चबाना।।१९।।

द्वार नासिका तेल लगाना ।
घर मे गूगल तनिक जलाना।।२०।।

फल जिसमे प्रोटीन चबायें ।
कोरोना को दूर भगायें।।२१।।

प्रबल शत्रु सम जग में आया ।
बूढ़े बालक पर ललचाया।।२२।।

जब तक स्वस्थ नही हो जाएं ।
द्वार लांघ बाहर ना आएं।।२३।।

केवल घर मे वक्त बिताएं ।
सामाजिक दूरी अपनाएं।।२४।।

घोर कष्ट-दायक महामारी ।
तुच्छ समझना भूल हमारी।।२५।।

संकट के बादल घहराये ।
काल शीश पर है मँडराये।।२६।।

बंदी सम हालात हमारे ।
प्रिय जन दूर हो रहे सारे।।२७।।

कैसे प्राण पथिक-बच पाये ।
कोई हे प्रभू राह सुझाये।।२८।।

चिंतन मनन भजन सब भूले ।
केवल दंभ ग्रसित हो फूले।।२९।।

इनकी भूल क्षमा कर दीजे।
इतनी दया जीव पर कीजे।।३०।।

*लक्ष्मीकान्त* सुमिर गुण गाये ।
रह निज धाम राम रस पाये।।३१।।

अब तो कृपा करो रघुराई ।
खुल कर सब लें फिर अँगड़ाई।।३१।।

दम्भ शक्ति मद में नर झूला ।
निर्धारित सीमाएँ भूला।।३३।।

उचित राह जग को दिखलाने ।
माया मोह रचे समझाने।।३४।।

नही विलग अस्तित्व हमारा ।
छिपा सृष्टि में अंश तुम्हारा।।३५।।

दूर करो मन का अँधियारा ।
हो जीवन मे फिर उजियारा।।३६।।

मिथ्या भ्रम से मुक्त कराओ ।
जग जीवन को तुम्ही बचाओ।।३७।।

बार – बार चरनन सिर नावा ।
विपद हरो सब कष्ट नसावा।।३८।।

अपनी कृपा दृष्टि बरसाओ ।
जीवन लता बहुरि सरसाओ।।३९।।

*लक्ष्मीकान्त* दास रघुराया ।
कोरोना का हाल सुनाया।।४०।।

*दोहा*
विमल बुद्धि बल ज्ञान का, प्रभु देना वरदान।
स्वास्थ्य संपदा को लभै, कष्टों का अवसान।।

*द्वारा :-✍️✍️✍️*
*लक्ष्मीकान्त शर्मा ‘रुद्रायुष*’
*( स्व-रचित / मौलिक )*
*देवली,विराटनगर,जयपुर,राज०303102*

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