कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ

कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ (आज के परिदृश्य में)

हर सेकंड बदलता अपडेट देखो,
रील में दौड़ता जीवन देखो,
AI लिख रहा है सपने सारे,
और तुम अब भी
पुराने ढर्रों में पड़े हुए हो।

छोड़ो मित्र!
वो पुरानी फाइल,
नए फ़ॉर्मेट में सोच लाओ,
संस्करण बदलो ज़रा सा,
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ।

जब तक घर में Wi-Fi चले,
तब तक सबको “ओके” कहना,
डिग्री, जॉब, शादी, EMI—
बस यही जीवन समझना।

माँ-बाप से रोज़ वीडियो कॉल,
पर पास बैठने का टाइम नहीं,
अलग फ्लैट, अलग दुनिया,
पर अपनापन—
नेटवर्क में कहीं नहीं।

सेल्फ-केयर के नाम पर
खुद से ही दूरी बढ़ाओ,
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ।

प्रभु से प्रार्थना—
“हे भगवान,
पैकेज थोड़ा बढ़वा दो,
लोन माफ़ हो जाए,
और बॉस का मूड सुधरवा दो।”

हिंदी-दिवस पर पोस्ट लगाओ,
#मातृभाषा ट्रेंड कराओ,
पर WhatsApp, मेल, मीटिंग में
अंग्रेज़ी का झंडा गाड़ जाओ।

इसे ग्लोबल माइंडसेट कहते हैं,
समझो, अपडेट हो जाओ,
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ।

कवि बनने का शौक़ है अगर,
तो आसान सा है फॉर्मूला—
दो लाइन दर्द,
तीन लाइन ब्रह्मांड,
बीच में डाल दो
“अस्तित्व”, “शून्य”, “अनंत” वाला झूला।

जिसे पाठक समझ जाए,
वो तो कंटेंट है भाई,
जिसे खुद लेखक भी न समझे,
वही साहित्य—
सबसे हाई।

इंस्टा पर डालो,
फिर कमेंट गिनवाओ,
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ।

चलते-चलते सड़क पर,
लाउडस्पीकर में रील चलाओ,
चौराहे पर खड़े-खड़े
व्लॉग बना कर
समोसा दिखाओ।

सक्सेस की दौड़ में ऐसे भागो,
कि थकान भी ब्रांड बन जाए,
इतने फेमस हो जाओ
कि गूगल भी
नाम लिखते ही डर जाए।

नई सभ्यता,
नई संस्कृति,
हर दिन नया पैकेज लाओ,
कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ।

वीकेंड प्लान बने तो,
मॉल या हिल स्टेशन जाओ,
स्टोरी में सनसेट डालो,
सूरज को भी
फिल्टर सिखाओ।

वे चाँद देखें,
तुम नोटिफिकेशन,
फिर दोनों मिलकर गुनगुनाओ—
“तू मेरा Wi-Fi,
मैं तेरी बैटरी।”

पिज़्ज़ा, बर्गर, कोल्ड-ड्रिंक,
उसी का भोग चढ़ाओ,
और अंत में
एक सेल्फी के साथ लिख दो—

“लाइफ सेट है।”

बस इतना ही काफ़ी है,
समाज को दिखाने के लिए—
कि हाँ भई,
तुमने भी
कुछ तो स्टैंडर्ड बना ही लिया।

मनीभाई नवरत्न (maniBhai Navratna )

कविता का विवरण / व्याख्या

“कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ (आज के परिदृश्य में)”
यह कविता आधुनिक समाज की सोच, जीवन-शैली और दिखावटी प्रगति पर तीखा, व्यंग्यात्मक और विचारोत्तेजक प्रहार है। कवि आज के व्यक्ति को आईना दिखाता है, जो तकनीक, ट्रेंड और तथाकथित सफलता में उलझकर जीवन के मूल अर्थ से दूर होता जा रहा है।


1. परिवर्तन बनाम जड़ता

कविता की शुरुआत इस तथ्य से होती है कि आज सब कुछ अत्यंत तेज़ी से बदल रहा है—
तकनीक, विचार, जीवन-शैली, यहाँ तक कि रचनात्मकता भी।
इसके विपरीत मनुष्य अब भी भाग्यवाद, बहानों और पुरानी मानसिकता में फँसा हुआ है।
कवि यहाँ प्रश्न करता है कि जब पूरा संसार अपडेट हो रहा है, तो मनुष्य अपनी सोच अपडेट क्यों नहीं करता?


2. आधुनिक पारिवारिक और सामाजिक विडंबना

कविता में आज के परिवारों की स्थिति पर व्यंग्य है—
जहाँ Wi-Fi और सुविधाएँ प्राथमिक हैं,
और रिश्ते केवल वीडियो कॉल या औपचारिक संवाद तक सीमित हो गए हैं।
अलग फ्लैट, अलग दुनिया और अलग जीवन-शैली अपनाना “प्रगति” मान ली गई है,
लेकिन भावनात्मक दूरी कोई समस्या नहीं मानी जाती।


3. धर्म, भाषा और दिखावे का दोहरापन

कवि दिखाता है कि आज लोग
धर्म को भी सुविधा और लाभ से जोड़कर देखते हैं—
प्रार्थना भी पैकेज, प्रमोशन और EMI तक सिमट गई है।

इसी तरह भाषा-प्रेम भी दिखावटी है—
हिंदी दिवस पर पोस्ट और हैशटैग,
लेकिन वास्तविक जीवन में अंग्रेज़ी को ही श्रेष्ठ मानना।
यह दोहरा चरित्र कविता का एक प्रमुख व्यंग्यात्मक बिंदु है।


4. आधुनिक साहित्य और सोशल मीडिया व्यंग्य

कविता में आज की “तुरंत कवि बनने” की संस्कृति पर तीखा कटाक्ष है।
जहाँ गूढ़, कठिन और अर्थहीन शब्दों को ही महान साहित्य मान लिया जाता है।
जो रचना समझ में आ जाए, उसे साधारण कह दिया जाता है,
और जो स्वयं लेखक को भी न समझ आए, वही “उच्च कोटि की कविता” कहलाती है।

सोशल मीडिया लाइक्स और कमेंट्स को साहित्यिक मूल्य का पैमाना बना देना—
इस प्रवृत्ति पर कविता सीधा प्रहार करती है।


5. सफलता, प्रसिद्धि और बनावटी जीवन

कविता में सफलता को ब्रांड, रील, व्लॉग और वायरल होने से जोड़ा गया है।
यह दिखाया गया है कि आज व्यक्ति
खुद जीने से ज़्यादा
दूसरों को दिखाने में व्यस्त है।

वीकेंड, घूमना, खाना, रिश्ते—
सब कुछ “स्टोरी” और “पोस्ट” के लिए है।
यथार्थ अनुभव से ज़्यादा
डिजिटल प्रस्तुति महत्वपूर्ण हो गई है।


6. प्रेम और संवेदना का आधुनिक रूप

कविता का एक गहरा व्यंग्य यह भी है कि
आज प्रेम और साथ होने का अर्थ
Wi-Fi, बैटरी और नोटिफिकेशन तक सिमट गया है।
प्रकृति, चाँदनी, भावनाएँ—
सब फ़िल्टर और स्क्रीन के पीछे छूटती जा रही हैं।


7. केंद्रीय संदेश

कविता का मूल संदेश है—
“स्टैंडर्ड” का अर्थ सिर्फ़ दिखावा, सुविधा और ट्रेंड नहीं है।

यदि सोच नहीं बदली,
संवेदना नहीं जागी,
और जीवन का उद्देश्य केवल प्रदर्शन बन गया—
तो यह प्रगति नहीं,
एक सुसज्जित खोखलापन है।


निष्कर्ष

यह कविता आज के समाज का
एक जीवंत, तीखा और सटीक व्यंग्यात्मक दस्तावेज़ है।
यह पाठक को हँसाते हुए
असहज प्रश्नों से रूबरू कराती है—

👉 क्या हम सच में आगे बढ़ रहे हैं?
👉 या केवल “स्टैंडर्ड” का अभिनय कर रहे हैं?

यही इस कविता की सबसे बड़ी सफलता है।

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