स्त्री शक्ति प्रतिमूर्ति – साधना मिश्रा

नारी जीवन और संवेदना

दुर्गा का निरूपण सिंह पर सवार एक देवी के रूप में की जाती है। दुर्गा देवी आठ भुजाओं से युक्त हैं जिन सभी में कोई न कोई शस्त्रास्त्र होते है। उन्होने महिषासुर नामक असुर का वध किया। महिषासुर (भैंसा जैसा असुर) करतीं हैं। हिन्दू ग्रन्थों में वे शिव की पत्नी दुर्गा के रूप में वर्णित

स्त्री शक्ति प्रतिमूर्ति – साधना मिश्रा Read More »

मेरे आँगन में आई नन्हीं चिड़िया

हिंदी कविता

नन्ही सी चिड़िया कितनी मेहनत से घोसला बनती है बिना किसी स्वार्थ के एक दिन सभी बच्चे छोड़ जाते है और उड़ जाते है खुले आसमान में . हमें कुछ सिख मिलती है इस से ..

मेरे आँगन में आई नन्हीं चिड़िया Read More »

अपने लिये जीना (अदम्य चाह)-शैली

समाज और यथार्थ

“अदम्य चाह”, शीर्षक की कविता, एक मध्यमवर्ग की भारतीय स्त्री की दिली हसरत है। बेटी जन्म से बंधनों में रहती है, परिवार, समाज के सैकड़ों पहरे और प्रश्न झेलती है, शादी के बाद तो पहरे और भी बढ़ जाते हैं। मेरा स्वयं का मन एक स्वच्छंद जीवन के लिए तरसता है, मुझे लगता है कि मैने स्त्री मात्र की हार्दिक इच्छा को शब्द दिये हैं.

अपने लिये जीना (अदम्य चाह)-शैली Read More »

Global-Warming-

प्रकृति बड़ी महान/यदि मैं प्रकृति होती

प्रकृति और पर्यावरण, हिंदी कविता

प्रस्तुत हिंदी कविता का शीर्षक प्रकृति है जो कि प्रकृति विषय वस्तु को आधार मानकर रची गई है। यह स्वरचित कविता है। दो कविताएं हैं। पहली में प्रकृति का महत्व बताया गया है और दूसरी में खुद प्रकृति बनकर प्रकृति से पूरी होने वाली जरूरत का अहसास दिलाने की कोशिश की गई है।

प्रकृति बड़ी महान/यदि मैं प्रकृति होती Read More »

स्वर्ण की सीढ़ी चढी है – बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

स्वर्ण की सीढ़ी चढी है – बाबू लाल शर्मा चाँदनी उतरी सुनहलीदेख वसुधा जगमगाई।ताकते सपने सितारेअप्सरा मन में लजाई।। शंख फूँका यौवनों मेंमीत ढूँढे कोकिलाएँसागरों में डूबने हितसरित बहती गीत गाएँ पोखरों में ज्वार आयाझील बापी कसमसाई।चाँदनी……………….।। हार कवि ने मान ली हैलेखनी थक दूर छिटकीभूल ता अम्बर धड़कनाआँधियों की श्वाँस अटकी आँख लड़ती पुतलियों

स्वर्ण की सीढ़ी चढी है – बाबू लाल शर्मा Read More »

गुलमोहर है गुनगुुनाता – बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

गुलमोहर है गुनगुुनाता – बाबू लाल शर्मा गुलमोहर है गुनगुुनाता,अमलतासी सी गज़ल। रीती रीती सी घटाएँ,पवन की अठखेलियाँ।झूमें डोलें पेड़ सारे,बालियाँ अलबेलियाँ।गीत गाते स्वेद नहाये,काटते हम भी फसल।गुलमोहर है गुनगुनाता,अमलतासी सी गज़ल। बीज अरमानों का बोया,खाद डाली प्रीति की।फसलें सींची स्वेद श्रम से,कर गुड़ाई रीति की।भान रहे हमको मिलेंगी,लागतें भी क्या असल।गुलमोहर है गुनगुनाता,अमलतासी सी

गुलमोहर है गुनगुुनाता – बाबू लाल शर्मा Read More »

इक शिखण्डी चाहिए – बाबू लाल शर्मा

हिंदी कविता

इक शिखण्डी चाहिए – बाबू लाल शर्मा पार्थ जैसा हो कठिन,व्रत अखण्डी चाहिए।*आज जीने के लिए,**इक शिखण्डी चाहिए।।* देश अपना हो विजित,धारणा ऐसी रखें।शत्रु नानी याद कर,स्वाद फिर ऐसा चखे। सैन्य हो अक्षुण्य बस,व्यूह् त्रिखण्डी चाहिए।।आज जीने के……. घर के भेदी को अब,निश्चित सबक सिखाना।आतंकी अपराधी,को आँखे दिखलाना। सुता बने लक्ष्मी सम,भाव चण्डी चाहिए।।आज जीने

इक शिखण्डी चाहिए – बाबू लाल शर्मा Read More »

प्रीत शेष है मीत धरा पर

हिंदी कविता

नवगीत- प्रीत शेष है मीत धरा पर प्रीत शेष है मीत धरा पररीत गीत शृंगार नवल।बहे पुनीता यमुना गंगापावन नर्मद नद निर्मल।। रोक सके कब बंधन जल कोकूल किनारे टूट बहेआँखों से जब झरने चलतेसागर का इतिहास कहे पके उम्र के संग नेह तबनित्य खिले सर मनो कमल।प्रीत……………………..।। सरिताएँ सागर से मिलतीनेह नीर की ले

प्रीत शेष है मीत धरा पर Read More »

Scroll to Top