कविता बहार

"कविता बहार" हिंदी कविता का लिखित संग्रह [ Collection of Hindi poems] है। जिसे भावी पीढ़ियों के लिए अमूल्य निधि के रूप में संजोया जा रहा है। कवियों के नाम, प्रतिष्ठा बनाये रखने के लिए कविता बहार प्रतिबद्ध है।

चंदन के ग़ज़ल (chandan ke gazal)

हिंदी कविता

यहाँ पर चंद्रभान पटेल चंदन के ग़ज़ल (Chandan Ke Gazal) के बारे में पढेंगे यदि आपको अच्छी लगी हो तो शेयर जरुर करें मैं दरिया के बीच कहीं डूबा पत्थर मैं दरिया के बीच कहीं डूबा पत्थर ,तू गहनों में जड़ा हुआ महँगा पत्थर।। तुझ को देख के नदी का पानी ठहर गया,तुझ को छू […]

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रामनाथ की कुण्डलिया

हिंदी कविता

रामनाथ की कुण्डलिया (1)  प्रातः  जागो भोर में ,                    लेके  हरि  का   नाम ।       मातृभूमि वंदन करो ,                    फिर पीछे सब काम ।।       फिर पीछे सब काम ,                   करो तुम दुनियादारी ।       अपनाओ    आहार ,                   शुद्ध ताजे  तरकारी ।।       कह ननकी कविराज ,                 मांस ये मदिरा त्यागो ।       देर  रात  मत जाग ,                  हमेशा   प्रातः 

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जाऊँ कैसे घर मैं गुजरिया

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जाऊँ कैसे घर मैं गुजरिया नटखट कान्हा ने रंग दी चुनरिया जाऊँ कैसे घर मैं गुजरियानीर भरन मैं चली पनघट को देख ना पाई उस नटखट कोडाली पे बैठा कदंब के ऊपरधम्म से कूदा मेरे पथ पर रोकी जो उसने मेरी डगरिया जाऊँ—- मेरी नजरें पथरा गई थी मैं तो बस घबरा गई थी अबीर गुलाल से सना था चेहरा आँखों

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वृंदावन की होली पर कविता

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वृंदावन की होली पर कविता पकड़ कलाई  रंग ड़ार दियो हाय भीगी मोरी चुनरिया ।श्याम रोके मोरी डगरिया ।ग्वाल सखाओं  की  लेकर  टोलीकान्हा आगये   खेलन होलीदेख कर मोहे निपट अकेलीकरने लगे कान्हा जोरा जोरीमैं शरमाऊँ ड़र ड़र जाऊँ न छोड़े मोरी कलइयां।श्याम रोके मोरी डगरिया ।वृंदावन होली खेलन आईरंग लो चाहे  जितना कन्हाईतेरे नाम की 

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मिल मस्त हो कर फाग में

हिंदी कविता

मिल मस्त हो कर फाग में सब झूम लो रस राग में।मिल मस्त हो कर फाग में।।खुशियों भरा यह पर्व है।इसपे हमें अति गर्व है।।यह मास फागुन चाव का।ऋतुराज के मधु भाव का।।हर और दृश्य सुहावने।सब कूँज वृक्ष लुभावने ।।मन से मिटा हर क्लेश को।उर में रखो मत द्वेष को।।क्षण आज है न विलाप का।यह

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holika-dahan

होलिका दहन पर हिंदी कविता / पंकज प्रियम

नारी जीवन और संवेदना

होलिका दहन पर हिंदी कविता / पंकज प्रियम बुराई खत्म करने का प्रण करेंआओ फिर होलिका दहन करें।औरत की इज्जत का प्रण करें,आओ फिर होलिका दहन करें। यहां तो हर रोज जलती है नारीदहेज कभी दुष्कर्म की है मारीरोज कोई रावण अपहरण करेपहले इनका मिलकर दमन करेआओ फिर….. हर घर प्रह्लाद सा कुंठित जीवनमां बाप

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Radha kishna holi

होली के दोहे – बासुदेव अग्रवाल

नारी जीवन और संवेदना

होली वसंत ऋतु में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण भारतीय और नेपाली लोगों का त्यौहार है। यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। होली रंगों का तथा हँसी-खुशी का त्योहार है। यह भारत का एक प्रमुख और प्रसिद्ध त्योहार है, जो आज विश्वभर में मनाया जाने लगा है। विकिपीडिया

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ऋतु बसंत आ गया

हिंदी कविता

ऋतु बसंत आ गया           बिखरी है छटा फूलों की,          शोभा इंद्रधनुषी रंगों की,          कोयल की कूक कर रही पुकार,          ऋतु बसंत आ गया,          आओ मंगल-गान करें।महुए के फूलों की मदमाती बयार,आम्र मंजरी की बहकाती मनुहार,सुरमई हुए जीवन के तार,ऋतु बसंत आ गया,आओ मंगल-गान करें।             महकी सी लगती है हर गली,             कुसुमित हर्षित है हर

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दिल की बात बताकर देखो

हिंदी कविता

दिल की बात बताकर देखो दिल की बात बताकर देखोमन में दीप जलाकर देखो।कौन किसी को रोक सका हैनाता खास निभाकर देखो।आँखों की बतिया समझो तोलब पर मौन सजाकर देखो।इश्क़ सफ़ीना सबका यक साथोड़ा पार लगाकर देखो।लोग जगत सब मैला यारोंमन का वहम मिटाकर देखो।रब का एक नज़रिया सब परऐसा भाव जगाकर देखो। राजेश पाण्डेय

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मंज़िल पर कविता

हिंदी कविता

मंज़िल पर कविता   सूर्य की मंज़िल अस्ताचल तक,तारों की मंज़िल सूर्योदय तक।नदियों की मंज़िल समुद्र तक,पक्षी की मंज़िल क्षितिज तक। अचल की मंज़िल शिखर तक,पादप की मंज़िल फुनगी तक।कोंपल की मंज़िल कुसुम तक,शलाका की मंज़िल लक्ष्य तक। तपस्वी की मंज़िल मोक्ष तक,नाविक की मंज़िल पुलिन तक।श्रम की मंज़िल सफलता तक,पथिक की मंज़िल गंतव्य तक।

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उपवन की कचनार कली है

हिंदी कविता

            उपवन की कचनार कली है उपवन की कचनार कली है ।घर भर में  रसधार ढ़ली  है ।।यह दुहिता जग भार नहीं है ।अवसर दो  हकदार नहीं है ।।समय सुधा रस सिंचित  बेटी ।पथ गढ़ती अब किंचित बेटी ।।नव  युग  प्रेरक है अब  देखो ।सृजन महत्व मिला सब देखो ।।अब खुद  जाग रही सपने में ।हक

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माँ पर कविता

हिंदी कविता

    माँ पर कविता   बड़ी हसरत भरी आँखे लिए क्या           ताकती है माँ ।नहीं कहती जुबाँ से वो मगर कुछ           चाहती है माँ ।।बदलते रोज हम कपड़े नये फैशन             जमाने   के ,तुम्हे कुछ है पता साड़ी पुरानी           टांकती है माँ ।अगर कोई कभी आये तुम्हारे घर            जरा    देखो ,कमी कोई न हो अक़सर झरोखे           झांकती

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