करिया बादर पर कविता
भुँईया के छाती ह फाटगे। पानी सुखागे हे घाट के।
भुँईया के छाती ह फाटगे। पानी सुखागे हे घाट के।
Ganeshotsav
लखनऊ में जो ओला ड्राइवर और एक लड़की की झड़प
मैंने अपनी स्वरचित कविता “विधवाएं” कुछ समय पहले ही लिखी है ,और इसे लिखने के लिए प्रेरणा भी मुझे यथार्थ ही मिली। कि हम चाहे कितनी ही तरक्की क्यूं न कर ले मगर हमारी सोच औरतों को लेकर अब भी संकीर्ण ही है।
जब नायक नायिका से बेइन्तहां सच्ची मोहब्बत करता है उनसे मिलने का वक्त आता है तो नायिका के तरफ से कुछ विरोधी खड़े हुए तब अन्त मे नायक इस कविता के द्वारा उनके सामने खुले रुप मे आगाज करता है –