जाऊँ कैसे घर मैं गुजरिया
Uncategorizedजाऊँ कैसे घर मैं गुजरिया नटखट कान्हा ने रंग दी चुनरिया जाऊँ कैसे घर मैं गुजरियानीर भरन मैं चली पनघट को देख ना पाई उस नटखट कोडाली पे बैठा कदंब के ऊपरधम्म से कूदा मेरे पथ पर रोकी जो उसने मेरी डगरिया जाऊँ—- मेरी नजरें पथरा गई थी मैं तो बस घबरा गई थी अबीर गुलाल से सना था चेहरा आँखों
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