पहला प्रेम / मनीभाई नवरत्न

पहला प्रेम

हमारा पहला प्रेम
नहीं होना चाहिए किसी और से ।
वह होना चाहिए हमारी
अपनी ही सर्वोच्च संभावना से —
एक उग्र, अडिग, अविराम प्रेम।

प्रेम की गुणवत्ता
नहीं हो सकती अलग
हमारे जीवन की गुणवत्ता से ।
यदि औसतपन में
जीवन भीगा हुआ है,
तो
कैसे दिव्य होगा प्रेम?
पर हम तो चाहते हैं
परीकथाओं जैसा प्रेम—
और स्वयं डरे हुए,
लालची, छोटे जीवन जीते हैं।

दलदल से कमल की
उम्मीद रखते हैं।
मगर पूछें—
हमारे होने की
बनावट क्या है?
क्या वह है गहरी ?
स्वच्छ और स्पष्ट ?
ये तो भरी हुई है,
आवश्यकताओं, असुरक्षाओं, भ्रमों से ।

एक चिंतित, संकीर्ण “मैं ”
किसे आकर्षित कर सकता है?
और ऐसा “मैं”
किस तरह का प्रेम
दे सकता है और झेल सकता है?

एक पात्र —मिट्टी का,
दरारों से भरा।
चाहता था अमृत ।
जो भी डाला गया, रिसता रहा।
पात्र बोला—
“अमृत ही खोटा है।”
पात्र कभी धारण करने योग्य
कभी बना ही नहीं।

छोटा जिएँ—
तो छोटापन ही होगा आकर्षित।
रिश्तों में, काम में, मित्रता में,
और दृष्टि में।
फिर टूटन, कड़वाहट, दोहराव।
वही कहानी,
वही निराशा— बार-बार।
क्योंकि कभी बदला ही नहीं स्रोत ।

फँसे क्यों रहें?
दुखद चक्र में बाहर को
दोष क्यों दें,
जब भीतर ज्यों का त्यों है?

उठें, जलें—
और रोशनी में।
हो जाएँ रूपांतरित ।
और फिर देखें—
कैसा प्रेम हमें घेरता है।

अब
सिर्फ़ रोमांस नहीं होगा।
सिर्फ़ सुख नहीं होगा।
अब होगा—
स्पष्टता और स्वतंत्रता का अनुनाद।
यही पहला प्रेम है—
जो सच में
प्रेम कहलाने योग्य है।

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