राष्ट्रवाद पर कविता

राष्ट्रवाद पर कविता

बाँध पाया कौन अब तक सिंधु के उद्गार को।
अब न बैरी सह सकेगा सैन्य शक्ति प्रहार को।1
तोड़ डालें सर्व बंधन जब करे गुस्ताखियाँ।
झेल पायेगा पड़ोसी शूरता के ज्वार को।2
कांपता अंतःकरण से यद्यपि बघारे शेखियाँ।
छोड़ रण को भागने खोजा करे अब द्वार को।3
मानसिकता में कलुष है छल प्रपंचों में जुटा।
कूटनीतिक योग्यता से अवसर न दें अब वार को।4
देश ने है ली शपथ हम आक्रमण न करें कभी।
हम सजग सैनिक खड़े हैं राष्ट्र के विस्तार को।5
राष्ट्रवादी भावना हम में भरी है कूट कर।
जाति धर्म न बाँट पाये अब हृदय उद्गार को।6
सैनिकों से प्रेरणा ले देश अब फिर एक हो।
आज पनपायें पुनः सब राष्ट्रवाद विचार को।7
कर्नल प्रवीण त्रिपाठी
नई दिल्ली, 10 फरवरी 2019
मोबाइल 7340145333
कविता बहार से जुड़ने के लिये धन्यवाद

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