सरदार पटेल : अदम्य इच्छाशक्ति का पथ
(अतुकांत कविता)
राष्ट्र एक व्यक्ति के कारण महान नहीं होता,
पर कभी-कभी
एक व्यक्ति
राष्ट्र की रीढ़ बन जाता है।
कठोरता जिसे लोग कठोरता समझते हैं,
वह भीतर जलते हुए कर्तव्य का ताप होता है।
सरदार पटेल
उसी ताप से बने
वही लौह बना
जिसने एक बिखरे देश को
एक धड़कन में जोड़ा।
करमसद की मिट्टी
साधारण थी
पर उससे जन्मा बालक
असाधारण।
देशभक्ति उसे विरासत में मिली
क्योंकि उसके पिता
स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम आंधी के सिपाही थे।
देश के दर्द से
परिचय बचपन में ही हो गया।
एक ग्रामीण बालक
जो खेतों की मिट्टी से खेलता,
पर भीतर
एक अनकहा संकल्प पलता था—
अन्याय को नहीं स्वीकारूँगा।
एक दृढ़ता
धीरे-धीरे
उसकी मुद्रा बनती चली गई।
आर्थिक संघर्ष ने
उसके सपनों को रोका नहीं
बस उनका रास्ता बदल दिया।
गाँव की प्राथमिक शिक्षा,
फिर मैट्रिक,
फिर मुक़्त्यारी परीक्षा—
जीवन ने सरल रास्ता नहीं दिया
पर उसने कभी सरलता की माँग नहीं की।
अदालत में खड़े होकर
वह केवल वकील नहीं था,
न्याय का संरक्षक था।
गोधरा में महामारी फैली
और पटेल ने
डर की दीवारें तोड़ दीं।
सेवा उनके लिए कर्तव्य नहीं
स्वभाव थी।
बीमारों के लिए
दिन-रात खड़े रहे
यहाँ तक कि
उनकी पत्नी भी
इसी सेवा-मार्ग में
निःशब्द विलीन हो गई।
दुख उन्हें डिगा न सका,
बल्कि और अडिग बना गया।
बेगार प्रथा का अपमान
उनकी आत्मा को चुभ गया।
अत्याचार को देखना
उनके स्वभाव में नहीं था—
लड़ना
उनका धर्म था।
पटेल ने आवाज़ उठाई
लोग जुड़ते गए
आन्दोलन बढ़ता गया
और एक दिन
दमन की वह कड़ी टूट गई।
यहीं से
स्वतंत्रता की आग
उनके भीतर निर्विकल्प हो उठी।
गाँधी की वाणी
और पटेल की दृढ़ता—
दो धाराएँ
एक ही समुद्र की ओर बह चलीं।
खेडा सत्याग्रह में
उनकी भूमिका
केवल नेतृत्व नहीं
बलिदान थी।
जेलें उन्हें रोक नहीं सकीं।
कराची अधिवेशन ने
उनकी कुशलता को पहचाना
और देश ने जाना—
संगठन ही शक्ति है
और पटेल
उस शक्ति के स्वामी हैं।
स्वतंत्रता के बाद
राष्ट्र मिला
पर राष्ट्र की एकता
अभी अधूरी थी।
छः सौ रियासतें
एक देश
और अनगिनत इच्छाएँ—
यह कार्य असम्भव लगता था।
पर लौह पुरुष
असंभव को
संभावना में बदलना जानते थे।
उनकी दृढ़ता
राजाओं केमत-पत्रों से नहीं
राष्ट्र की आवश्यकता से संचालित थी।
धैर्य और कठोरता
दोनों हथियार बने
और भारत
एक राष्ट्र बनकर
मानचित्र पर उभरा।
वह केवल गृहमंत्री नहीं थे,
राष्ट्र के प्रहरी थे।
विभाजन के घावों को
मरहम लगाते हुए
उन्होंने देश को
एक नई दिशा दी।
15 दिसंबर 1950—
देश ने अपना
लौह स्तम्भ खो दिया।
पर खोया क्या?
जिसकी दृढ़ता
आज भी हर भारतवासी के भीतर
शक्ति की तरह धड़कती है।
सरदार पटेल
किसी किताब का पात्र नहीं
हमारी एकता के आधार हैं।
उनका जीवन कहता है—
साहस निर्णय बनता है,
निर्णय राष्ट्र।
और राष्ट्र
केवल सीमा से नहीं
चरित्र से बनता है।
-मनीभाई नवरत्न






