शहीदों की कुर्बानी पर कविता -मनोरमा जैन पाखी

शहीदों की कुर्बानी पर कविता -मनोरमा जैन पाखी

पवन वेग से उड रे चेतक ,
जहाँ दुश्मन यह आया है ।
रखा रुप विकराल दुष्ट ने ,
ताँडव  वहाँ  मचाया  है।


रक्तरंजित हो गयी धरा ,
निर्दोषो के खून से।
जाने न पाये दुष्ट नराधम
रंग दे भू उस खून से ।


रही सिसकती आज वसुंधरा
देखे अपना दामन लाल।
न जाने कितनी माँ बहने,
भैया  खोए खोये लाल।


बन कर कहर  टूटना होगा,
विकराल हवा बन जाना।
कर नष्ट भ्रष्ट  नापाक तंत्र,
रुप काली का धर आना।


मत बनना मेघदूत,
प्रियतम को रिझाने,
आज बन दूत दुर्गा का
दुश्मन को मिटाने।


लौटना तभी जब शहादत का बदला चुका ले,
शहीदों की कुर्बानी धूल में मिलने से बचा ले।

मनोरमा जैन पाखी
मेहगाँव ,जिला भिंड ,मध्य प्रदेश

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