सुभाषचन्द्र बोस : एक अक्षय अग्नि / मनीभाई नवरत्न

सुभाषचन्द्र बोस

सुभाषचन्द्र बोस : एक अक्षय अग्नि

(अतुकांत कविता)

इतिहास कभी–कभी
एक ऐसे व्यक्तित्व को जन्म देता है
जो केवल घटनाओं का हिस्सा नहीं होता,
बल्कि स्वयं
नयी दिशा देता है।
सुभाषचन्द्र बोस
ऐसे ही पुरुष थे—
जो मृत्यु के बाद भी
युवाओं की नसों में
विद्रोह की गर्मी जगाते रहे।

साहस
उनका परिचय नहीं,
उनकी धड़कन था।
इसीलिए वे ‘नेताजी’ हुए—
मरकर भी जीवित,
चुप रहकर भी बोलते हुए।

23 जनवरी 1897—
कटक की मिट्टी में
एक दीप जला
जो बाद में
एक महाद्वीप को रोशन करेगा।
एक बड़ा परिवार,
साधारण परिस्थितियाँ,
पर मन
असाधारण प्रश्नों से भरा—
अन्याय क्यों है?
और इसे बदलेगा कौन?

आई.सी.एस.—
सम्मान, सुरक्षा, भविष्य,
सब कुछ सामने था।
पर सुभाष
किसी कुर्सी के लिए नहीं बने थे।
उन्होंने जाना—
दासता से बड़ा पद
कोई नहीं होता।
और एक दिन
उन्होंने कलम रख दी
और कहा—
“मेरे देश को मुझे चाहिए,
मैं जा रहा हूँ।”

त्याग
उनके लिए निर्णय नहीं,
स्वाभाव था।

नजरबंदी की दीवारें
उन्हें रोक नहीं सकीं।
26 जनवरी 1941 की रात
चुपचाप
एक यात्रा शुरू हुई—
काबुल से बर्लिन,
और फिर
सागर पार
जापान तक।
यह यात्रा
किसी एक व्यक्ति का पलायन नहीं
एक राष्ट्र की नयी रणनीति थी।

वे जहाँ गए
वही भारत की गूँज साथ ले गए।

जापान की धरती पर
रामबिहारी बोस से मिली ऊर्जा
और सुभाष की ज्वाला
एक हो गई।
उन्होंने पुकारा—
“तुम मुझे खून दो
मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा।”
और यह वाक्य
केवल नारा नहीं
एक शपथ बन गया।

युवक उठ खड़े हुए,
सैनिक
अपने हृदय बदलकर
नई सेना में जुड़ गए।
आजाद हिन्द फ़ौज
केवल हथियारों की सेना नहीं थी—
वह भारत के सपनों का स्वरूप थी।

सिंगापुर—
जहाँ पहली बार
भारत ने स्वयं को
एक स्वतंत्र शासन की कालिमा में
देखा।
नेताजी ने कहा—
“आज से हमारा संघर्ष
केवल मोर्चों पर नहीं,
भारत की आत्मा में भी चलेगा।”

उन्होंने झंडा फहराया
और दुनिया को बताया—
एक दास देश भी
स्वतंत्रता का दावा
साहस से कर सकता है।

फिर एक दिन
रेडियो की आवाज़ आई—
तेहकू में दुर्घटना।
सुभाष नहीं रहे।
देश स्तब्ध।
पर मन
विश्वास नहीं कर पाया।
इतिहास आज भी
उस धुँध को नहीं साफ कर पाता
जिसमें एक विमान
और एक महापुरुष
गायब हो गए।

क्या वे सचमुच गए?
या किसी और रूप में
संघर्ष जारी रखा?
जवाब
आज भी अनुत्तरित है।

पर एक बात स्पष्ट है—
सुभाष मरने वाले नहीं थे।
वह नाम
सिर्फ जीवित रहता है।

भारत स्वतंत्र हुआ
पर सुभाष
किसी जयंती, किसी प्रतिमा,
किसी पंक्ति में सीमित नहीं हुए।
वे आज भी
युवाओं की आँखों में चमकते हैं,
साहस के रूप में,
विद्रोह के रूप में,
अदम्य संकल्प के रूप में।

उनका जीवन कहता है—
मृत्यु शरीर की होती है,
इच्छाशक्ति की नहीं।
और राष्ट्र
केवल राजनीति से नहीं
बलिदानी हृदयों से बनता है।

सुभाषचन्द्र बोस
एक अध्याय नहीं,
एक चेतना हैं।
और चेतना
कभी नहीं मरती।

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