स्वामी दयानन्द सरस्वती – मनीभाई नवरत्न

स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्वामी दयानन्द सरस्वती – मनीभाई नवरत्न

उन्नीसवीं शताब्दी के धूमिल क्षितिज पर
जब राष्ट्र की आत्मा अंधकार में ढंकी थी,
जब मनुष्य की चेतना जड़ता के बोझ तले दबी थी,
तभी एक तेजस्वी दीप्ति उठी—
संस्कारों में तप्त, ज्ञान में प्रखर,
जो स्वयं प्रकाश बनकर जनमन में आशा की लौ जलाने आया।

टंकारा की मिट्टी में जन्मा मूलशंकर
केवल बालक नहीं, भविष्य का शंखनाद था।
संस्कार कठोर, व्रत दृढ़,
और भीतर जलता प्रश्न—
“सत्य क्या है? ईश्वर का रूप क्या है?”
यही प्रश्न उसे साधना के पथ पर ले चले,
वही प्रश्न आगे चलकर आर्यसमाज की नींव बने।

एक शिवरात्रि की रात
चूहे द्वारा खाई जा रही नैवेद्य-सामग्री
उसके भीतर प्रश्नों का तूफान बन गई।
वह भाव विह्वल हुआ—
“जो स्वयं को न बचा सके
वह भक्तों को क्या बचाएगा?”
यहीं से उसका विरोध शुरू हुआ,
और यहीं से आर्य चेतना का नवोदय भी।

वैराग्य की धूल भरे पथ पर
गुरु पूर्णानंद का आशीर्वाद मिला,
फिर मथुरा में विरजानंद के कठोर अनुशासन ने
तपस्वी को द्रष्टा बना दिया।
“देश अंधकार में है—
जाओ, दीप बनो।”
गुरु का यही वचन
आर्यसमाज की स्थापना का बीज बन गया।
वह देश भर में घूमे—
जागृति जगाते, भ्रम तोड़ते,
और वैदिक धर्म का नया सूर्योदय रचते हुए।

उनके शब्द अग्नि थे,
पर उद्देश्य ताप नहीं—
अज्ञान का नाश था।
‘सत्यार्थ प्रकाश’ केवल ग्रंथ नहीं,
राष्ट्रीय पुनर्जागरण की धड़कन है—
जहां तर्क है, विज्ञान है, सुधार है,
और सत्य की अडिग पुकार है।
उन्होंने वेदों को नई दृष्टि दी,
अर्थ को नया आयाम।

गुजराती जन्म,
पर हृदय में हिन्दी की राष्ट्रीय धड़कन।
उसने कहा—
“यदि राष्ट्र एक होगा,
तो उसकी भाषा भी एक होनी चाहिए।”
आर्यभाषा के रूप में
हिन्दी को वे जन-जन तक ले गए।
गुरुकुलों में, समाजों में, सभा-स्थलों में—
यह भाषा राष्ट्र-स्वर बनकर उभरी।

वे गाँव-गाँव गए,
नगर-नगर पहुँचे,
अन्याय और आडंबर की जकड़न में
जकड़े समाज को झकझोरा।
उनके चरणों की धूल
भारत-भूमि के स्वप्न जागरण की मिट्टी बनी।
राजस्थान, पंजाब, उत्तरप्रदेश, बिहार—
सब ओर उनका वाणीकल्प दीप जला।

वे अकेले थे, पर सत्य उनके साथ था।
मूर्तिपूजा, अस्पृश्यता, आडंबर—
जिसे समाज पूज्य मान बैठा था,
उन्होंने प्रश्न किया, चुनौती दी,
सत्य के तराजू पर तौलकर
असत्य का भ्रम तोड़ दिया।
उनके शब्दों में भय नहीं,
केवल सुधार की तप्त पुकार थी।

आर्यसमाज एक संस्था नहीं—
एक जनांदोलन था।
गांवों में विद्यालय खुले,
गुरुकुलों में स्वाभिमान जागा,
विदेशों में भी आर्य-ध्वज लहराया।
दयानन्द ने जनता को बताया—
“अधिकार मांगो नहीं,
योग्य बनकर उन्हें प्राप्त करो।”
यही संदेश आगे चलकर
स्वाधीनता की तपश्चर्या का आधार बना।

जोधपुर की रात,
विश्वासघात की आंच,
विष की पीड़ा से तपता शरीर—
पर चेहरे पर शांति।
अजमेर की ओर जाते हुए
उनकी सांसें धीमी होती गईं,
और दीपावली की मधुर सांझ में
उस महान आत्मा ने कहा—
“हे ईश्वर, तेरी इच्छा पूर्ण हो।”
वह देह-दीप बुझ गया,
पर राष्ट्र का सूर्य बनकर अमर हो गया।

स्वामी दयानन्द केवल सन्यासी नहीं,
एक युग-प्रेरक थे।
उनकी वाणी, उनका ग्रंथ,
उनके आदर्श, उनके संघर्ष—
आज भी राष्ट्र की नसों में धड़कते हैं।
उन्होंने बताया—
सत्य कठिन हो सकता है,
पर वही मुक्ति का मार्ग है।
उनकी स्मृति दीपावली का दीप नहीं,
भारत की आत्मा का अनंत प्रकाश है।
वह प्रकाश जो सदियों तक
राष्ट्र को दिशा देता रहेगा।

– मनीभाई नवरत्न

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