स्वामी विवेकानन्द : जागरण का महागान
(अतुकांत, मौलिक कविता)
भारत की भूमि
वह तपोभूमि है
जहाँ ऋषियों की वाणी
अभी भी वायु में गूँजती है।
उसी भूमि ने
उन्नीसवीं शताब्दी में
एक ऐसी तेजस्वी आत्मा को जन्म दिया
जिसने आत्मा की रोशनी से
समूची मानवता को दिशा दी—
स्वामी विवेकानन्द।
वे केवल संन्यासी नहीं थे,
वे आधुनिक युग के महर्षि थे—
तर्क और श्रद्धा का अद्भुत समन्वय,
विज्ञान और आध्यात्म का अखण्ड सेतु।
उनका जीवन
दिखाता है
कि धर्म जड़ नहीं,
निरन्तर विकसित होने वाली चेतना है।
12 जनवरी 1863—
कलकत्ता की एक सुबह
जब संसार ने
नरेन्द्र नाम के बच्चे के रूप में
एक भविष्य का विश्व-गुरु पाया।
पिता का विवेक
और माता की भक्ति
उनके भीतर
एक साथ धड़कने लगे।
व्यायाम की दीप्ति,
संगीत की कोमलता—
उनका व्यक्तित्व
शक्ति और सौंदर्य का
संतुलित संगम था।
किशोर नरेन्द्र
मस्तिष्क से तेज,
और हृदय से
अद्भुत करुणा से भरे।
प्रश्नों की अग्नि
उन्हें साधु-संतों के द्वार ले जाती,
पर उत्तर नहीं मिलता।
वह एक ही प्रश्न पूछते—
“क्या आपने ईश्वर को देखा है?”
और केवल एक व्यक्ति ने कहा—
“हाँ, जैसे तुम्हें देख रहा हूँ
वैसे ही ईश्वर को देखता हूँ।”
वह व्यक्ति था—
रामकृष्ण परमहंस।
गुरु और शिष्य
मानो दो नदियों की संगम-धारा बन गए।
नरेन्द्र से विवेकानन्द बनने की यात्रा
आत्मचिन्तन की तपस्या थी—
जहाँ उन्होंने
संसार की क्षणिकाओं को
और आत्मा की शाश्वतता को
स्पष्ट पहचाना।
उन्होंने जाना—
सत्य बाहर नहीं,
अंदर जागता है।
फिर एक दिन
उस तीर्थयात्रा की शुरुआत हुई
जिसने भारत को
विश्व-नक्शे पर
आध्यात्मिक शक्ति के रूप में उभारा।
1893 का शिकागो—
जब एक साधु ने
“बहनो और भाइयो” कहकर
विश्व को
मानवता का नया अर्थ समझाया।
उनके शब्द
हृदयों को भेदते गए,
और वे
विश्व-मानव बन गए।
पर विदेशों की जयध्वनि
उनके लिए पर्याप्त नहीं थी।
भारत लौटकर
उन्होंने जो देखा
वह उन्हें भीतर तक विचलित कर गया—
भूख, दरिद्रता, अशिक्षा।
उनका हृदय पुकार उठा—
“दरिद्र नारायण की उपेक्षा
राष्ट्र का पाप है।”
उन्होंने सेवा को
सबसे ऊँचा साधना-कर्म कहा।
वे कहते थे—
मनुष्य की उपाधि
उसकी बाहरी स्थिति से नहीं,
उसके भीतर के प्रकाश से होती है।
आत्मा की उन्नति
उनके विचारों की धुरी थी।
धर्म, उनके लिए
कोई कर्मकाण्ड नहीं,
बल्कि
चरित्र की शक्ति थी।
बेलूर मठ में
5 जुलाई 1902 को
उनकी देह स्थिर हुई,
पर उनका प्रकाश
अनश्वर हो गया।
विवेकानन्द
एक नाम नहीं,
भारत की आत्मा का स्पंदन हैं—
जो हर युग में
नवयुवकों को
उठने, जागने, और
लक्ष्य के प्राप्त होने तक न रुबरुकने
की प्रेरणा देता है।
उनकी ज्योति
आज भी समुद्र-तट पर खड़ी
कन्याकुमारी की विशाल प्रतिमा में
और करोड़ों भारतीयों के हृदय में
अमर है।
क्योंकि
विवेकानन्द
कभी मरे ही नहीं—
वे विचार बनकर
हमारे भीतर जीते हैं।






