बसंत की पहली साँस

बसंत की पहली साँस
धीरे से आई…
जैसे किसी सोई हुई धरती के कानों में
किसी ने प्रेम से फुसफुसाया हो।

ठिठुरती हवाओं के काँपते कंधों पर
जब धूप ने रख दिया अपना गरम हाथ,
तभी कहीं दूर
कोयल ने पहली बार
मन का कोई अधूरा गीत गाया।

सूखे पत्तों की थकी हुई सरसराहट
अब हरियाली की उम्मीद में बदलने लगी है।
कलियों ने अपनी बंद मुट्ठियाँ खोली हैं,
और आकाश ने नीलेपन को
फिर से पहन लिया है।

बसंत की पहली साँस
सिर्फ मौसम का बदलना नहीं—
यह मन का भी खिलना है,
यह उम्मीद का लौट आना है,
यह विश्वास का फिर से जन्म लेना है।

जहाँ ठंड ने रिश्तों को जकड़ लिया था,
वहाँ अब स्पर्श में कोमलता है।
जहाँ मन में धुंध थी,
वहाँ अब स्पष्ट उजाला है।

बसंत कहता है—
“रुको मत…
जीवन फिर से फूल सकता है।”

और सच में,
जब बसंत पहली साँस लेता है,
तो केवल पेड़ ही नहीं,
मन भी हरा हो जाता है। 🌸✨

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