अपनी ही मूर्खता पर हँस पाना

Laughing at Your Own Idiocy
(अपनी ही मूर्खता पर हँस पाना)
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता)

बुद्धिमान बनने की
शुरुआत
तभी होती है,
जब
तुम अपनी मूर्खता
देख पाते हो।

मनुष्य होने का अर्थ
सिर्फ़ कोमलता नहीं—
इसमें
उन्मादी क्रोध है,
अविराम वासना है,
बेईमानी की
भयानक खिंचाव है।

ये कोई अपवाद नहीं,
ये जीवन की
प्राकृतिक शक्तियाँ हैं।
वे इसलिए नहीं उठतीं
कि तुम खराब हो,
वे इसलिए उठती हैं
क्योंकि
तुम जीवित हो।

कभी न कभी
वे तुम्हें
पकड़ ही लेंगी।
और जब ऐसा हो—
तो
इंकार मत करना।

दबाना मत,
सजाना मत,
और सबसे ज़रूरी—
छिपाना मत।

जो झूठ है
उसे झूठ कहो।
जो वासना है
उसे वासना।
जो क्रोध है
उसे क्रोध।
जो शर्म है
उसे शर्म।

उसे
“रणनीति” मत कहो,
“पैशन” मत बनाओ,
“आत्मरक्षा” का
मुखौटा मत पहनाओ।

नंगे खड़े हो जाओ—
भीतर।
बिना बहाने,
बिना सफ़ाई।

उस क्षण
देखो
कि तुम सच में
क्या हो।

और जब
उस आग से
गुज़र जाओ—
बिना नक़ाब,
बिना अभिनय—
तो
हँस पाना चाहिए।

घमंड से नहीं,
हल्केपन से।

और अगर
बीच आग में
हँस सको—
तो
और भी सुंदर।

इसका अर्थ है—
थोड़ी दूरी
बनने लगी है।
तुम
अपने को
देखने लगे हो।

यही
प्रगति है।

धन्य है वह
जो कह सके—
“यार, मैं कितना मूर्ख था।”

और उससे भी
अधिक धन्य वह
जो कह सके—
“यार, मैं मूर्ख हूँ।”

यहीं
अहंकार
ढहता है।
यहीं
बुद्धि
झाँकती है।

और यदि
आज
तुम
“मैं मूर्ख हूँ”
न कह सको—

तो कम से कम
इतना कह दो—
“मैं मूर्ख था।”

यही
शुरुआत है।

यहीं से
चलना शुरू करो—
ज्ञान
पीछे-पीछे
अपने आप
आ जाएगा।
Scroll to Top