इतने होशियार कि विवेक खो बैठे

इतने होशियार कि विवेक खो बैठे

डर और लालच से चली
चतुराई—
मूर्खता का ही
दूसरा नाम है।

निरर्थक कामों में
हम कितने सफल हैं!
खुद को खुश करने के लिए
हमेशा
कोई रास्ता निकाल लेते हैं।

चूहे की तरह—
घर में घुसने का
छेद जानते हैं।
और अगर न हो,
तो
खुद खोद लेते हैं।

हमारी सारी होशियारी
छोटी-छोटी
लालसाओं के लिए
आरक्षित है।

क्या हम मूर्ख हैं?
नहीं।

बेकार लक्ष्यों के पीछे
हम इतनी ऊर्जा
झोंक देते हैं
कि
आसमान हिल जाए।

पर
जहाँ सच में
ध्यान चाहिए,
वहाँ
अचानक
सब खाली।

याददाश्त खो जाती है।
सुस्ती आ जाती है।
आलस्य जन्म लेता है।

सही चीज़
आवाज़ देती है—
और हम
अनसुना कर देते हैं।

सही क्या है?

जो
शांत स्पष्टता से
उभरता है।
जो
निर्लिप्त देखने से
जन्म लेता है।

संवेदना से नहीं,
भावुकता से नहीं,
उत्तेजना से नहीं—
बोध से।

मूर्खता में भी
हमारा बुद्धि-तंत्र
काम कर रहा होता है।

हम बेवकूफ नहीं,
हम
विनाशकारी रूप से
चतुर हैं।

तेज़—
पर भीतर से
अंधे।

शायद
हमें
और चतुर होने की
ज़रूरत नहीं।

हमें चाहिए—
भीतरी सरलता।

दिखावे की नहीं,
आदतों की नहीं—
उस सरलता की
जो
मन के खेल
बिना धोखे के
देख सके।

सीधे।
ईमानदारी से।
स्पष्ट।

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