घाव को सहलाना बंद करो
घाव जिसे हर रोज़ सहलाया गया,
वह कभी नहीं सीखा खड़ा होना।
थोड़ी-सी चोट, थोड़ी-सी आलोचना—
और हम उसे तकिया, आईना, मरहम दे आए।
“कोई बात नहीं, तुम बहुत संवेदनशील हो,”
“दुनिया ही ऐसी है”—
इन शब्दों से घाव गहरा होता गया,
अहंकार मजबूत, पैर कमजोर।
क्यों हम नाज़ुकता को प्यार समझ बैठे?
क्यों हर आहत को सुरक्षित रखना चाहते हैं?
छोटा रोना, छोटी शिकायत—
हम दौड़ पड़ते हैं शांति देने।
पर ध्यान रखो—
घाव शत्रु नहीं, संकेत है।
यह बताता है—
कहाँ अभी भी आसक्ति है,
कहाँ अभी भी निर्भरता है।
जो हर ठोकर पर कंधा देता है,
वह दयालु दिखता है,
पर जिसने चोट को देखना सिखाया,
वहीं स्वतंत्रता का बीज बोता है।
सच्चा प्रेम आँसू नहीं पोंछता,
भ्रम पोंछता है,
और उस व्यक्ति को
अपने आप से मिलने देता है।
तो घाव को सहलाना बंद करो,
कदमों को खुद मजबूत होने दो,
और आत्मा को
अपने भीतर से उठने दो।





