चाह गई चिंता मिटी

चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।
जिनको कछु न चाहिए, वे साहन के साह॥

रहीम कहते हैं कि किसी चीज़ को पाने की लालसा जिसे नहीं है, उसे किसी प्रकार की चिंता नहीं हो सकती। जिसका मन इन तमाम चिंताओं से ऊपर उठ गया, किसी इच्छा के प्रति बेपरवाह हो गए, वही राजाओं के राजा हैं।


स्रोत :पुस्तक : रहीम ग्रंथावली (पृष्ठ 82) रचनाकार : रहीम प्रकाशन : वाणी प्रकाशन संस्करण : 1985

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