जाओ, ज़िंदगी जियो”

“एह! जाओ, ज़िंदगी जियो”

दुनिया
डरावने चेहरे पहनकर आती है,
मास्क लगाकर,
फुफकारते साँप दिखाकर,
ड्रैगन की तरह गुर्राकर—
बस तुम्हारी शांति हिलाने के लिए।

और तुम?
एक आँख खोलते हो,
उसे देखते हो—
और कहते हो,
“एह?”

फिर करवट बदलकर
सो जाते हो।

यही है असली मालिकाना हक़।
यही है दुनिया पर राज।

जो हर जगह
खेल का मैदान ढूँढ लेता है,
हर जगह
नाचने की जगह बना लेता है—
वही निर्दोष,
वही सुरक्षित,
वही आनंदित है।

बाकी सब
गंभीरता का अभिनय कर रहे हैं,
खुद को ही डराने में व्यस्त,
और खेल चूक रहे हैं।

जब हालात
तुम्हें डराने पर तुले हों,
जब लोग
तुमसे प्रतिक्रिया भीख में माँग रहे हों,
तब सबसे बड़ी प्रतिक्रिया है—
कोई प्रतिक्रिया न देना।

वे उछलते हैं,
चीखते हैं,
डरावना नृत्य करते हैं—
ताकि तुम हिलो।

और तुम?
खर्राटे लेने लगते हो।

उनकी साज़िश
यहीं दम तोड़ देती है।

क्योंकि
जो प्रभावित नहीं होता,
उसी के पास
सबसे गहरा सुख होता है।

इस सुख का नाम है—
आनंद।

घर में रहो।
हल्के रहो।
निर्दोष रहो।

एक ऐसे बच्चे की तरह
जो अस्तित्व की गोद में
बेफिक्र सोया है—
और दुनिया से कह रहा है,

“एह!
जाओ…
ज़िंदगी जियो।”
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