तुम वही बन जाते हो, जो भीतर लेते हो
साथ
मासूम नहीं होता।
वह
धीरे-धीरे
तुम्हें गढ़ता है।
जीवन को
सबसे तेज़
और सबसे गहरे
कुछ बदलता है—
वह है
संगति।
वातावरण।
इसलिए
सतर्क रहो।
किससे मिलते हो,
क्या पढ़ते हो,
क्या देखते हो,
क्या सुनते हो,
क्या खाते हो—
यह सब
तुम्हारे भीतर
उतर रहा है।
अंधाधुंध
कुछ भी
अंदर मत आने दो।
इंद्रियाँ
हर क्षण
पी रही हैं।
और
तुम वही बनते हो
जो
वे पी लेती हैं।
हाँ,
एक बिंदु आता है—
जब
सावधानी की ज़रूरत
नहीं रहती।
जब
भीतर की स्पष्टता
इतनी प्रबल हो जाती है
कि
बाहर से
कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
पर
जब तक
वह बिंदु
न आए—
सचेत रहो।
यह डर नहीं है।
यह
बुद्धिमत्ता है।
क्योंकि
जो भीतर जाता है,
वही
आहिस्ता-आहिस्ता
तुम बन जाता है।
और
अपने बनने की प्रक्रिया में
लापरवाह होना—
सबसे बड़ी
अचेतना है।





