“पशु होकर जन्म, पर उठने के लिए बने”
शरीर
पशु से मिलता है—
भूख,
डर,
संरक्षण की चाह।
यह स्वाभाविक है।
पर मन भी
अगर
यहीं अटक जाए—
तो प्रश्न उठता है।
पशु
ईर्ष्या करता है—
इलाका बचाने के लिए।
पशु
धोखा देता है—
जीने के लिए।
पशु
हिंसा करता है—
खतरे में।
यह जंगल का नियम है।
अब अपने भीतर देखो—
क्या
रोज़ी कमाने के लिए
ईर्ष्या ज़रूरी है?
क्या
साँस लेने के लिए
धोखा चाहिए?
क्या
जीने के लिए
हिंसा अनिवार्य है?
अगर नहीं,
तो फिर
इन प्रवृत्तियों को
“स्वभाव” कहकर
ढोते क्यों हो?
मनुष्य
केवल शरीर नहीं है।
मनुष्य
चेतना की संभावना है।
शरीर को
उसका काम करने दो—
खाना,
आराम,
संरक्षण।
पर मन को
जंगल में मत छोड़ो।
जब ईर्ष्या उठे—
देखो।
जब क्रोध भड़के—
पहचानो।
जब लालच खिंचे—
समझो।
देखना ही
पहला उठना है।
पशु प्रवृत्ति
दबाने से नहीं जाती,
देखने से छूटती है।
जो
अपने भीतर के
पशु को पहचान ले,
वह
उसका दास नहीं रहता।
जन्म
पशु का हो सकता है,
पर जीवन
उससे ऊपर उठने का
आमंत्रण है।
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