पृथ्वी जलती है क्योंकि तुम जलते हो

पृथ्वी जलती है क्योंकि तुम जलते हो

भूख पेट में नहीं,
मन में रहती है।
अंधी, बेचैन,
कभी न भरने वाली—
और उसी ने
सब कुछ खा लिया।

तुम गलत जीकर
सही उपभोग की
आशा कैसे करते हो?

धरती से रिश्ता
तुम्हारे जीवन जैसा है—
टूटा हुआ,
अचेत,
लालची।

सही जीवन
किसी नीति से नहीं,
जागरूकता से शुरू होता है।

जीवित होना
सचेत होना है।
और सचेत होना
खुद को जानना है।

जो स्वयं को नहीं जानता,
वह जंगल काटेगा।
जो भीतर खाली है,
वह नदी ज़हर करेगा।
जो अंदर जल रहा है,
वही हवा जलाएगा।

धुआँ बाहर नहीं उठता—
पहले भीतर भरता है।

कार्बन केवल गैस नहीं,
यह अज्ञान का
धुआँ है।

तुम कहते हो—
समस्या मशीनों की है।
सच यह है—
समस्या मन की है।

आठ अरब लोग
अगर और-और चाहेंगे,
तो प्रश्न यह नहीं कि
विनाश होगा या नहीं—
प्रश्न है
कब होगा।

तीसरी गाड़ी
क्या देगी
जो पहली दो नहीं दे सकीं?
यह नैतिक प्रश्न नहीं,
यह होश का प्रश्न है।

सचेत जीवन
कम उपभोग करता है—
योजना से नहीं,
स्वभाव से।

न कानून बचाएँगे,
न सम्मेलन।
अंधी भीड़ से
दृष्टि की उम्मीद
बेवकूफी है।

सरकारें
लोगों जैसी ही होती हैं।
जो जनता सोती है,
वह नेता भी
सोता हुआ चुनती है।

समाधान
राजनीतिक नहीं,
व्यक्तिगत है।

यह उपदेश नहीं,
यह यथार्थ है।

धरती
कोई विचार नहीं,
एक शरीर है—
और वह
तुम्हारे नीचे
जल रहा है।
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