बढ़ो, केवल चमको मत
खुद में निवेश करो।
दिखावे में नहीं।
ईंधन भरो—
ज्ञान, कर्म, साधना की।
ना कि चमकते आभूषणों की।
हीरे जड़ दो डैशबोर्ड में,
सोने की हँसी लगाओ दरवाजों पर,
पर इंजन को मत भूलो।
वरना रॉयल दिखोगे,
पर कहीं नहीं पहुँचोगे।
समय, ऊर्जा, ध्यान—
यह असली इंजन है।
छोटे झूठे आभूषण
रुकावट बन जाते हैं।
वह व्यक्ति जो नई घड़ी पहनता है,
सच्चाई नहीं खोजता,
पढ़ाई, साधना, स्वास्थ्य—
सब पीछे छूट जाता है।
दिखता है चमकता,
पर यात्रा ठहरी।
पूछो खुद से—
क्या मैं केवल चमक रहा हूँ
या सचमुच बढ़ रहा हूँ?
बढ़ो—
ज्ञान में, अभ्यास में, स्वास्थ्य में, आत्म-अन्वेषण में।
चमक खुद आएगी।
पर इंजन मजबूत होगा,
और यात्रा स्थायी।





