“बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना”

“बीमार दुनिया में स्वस्थ रहना”

दुनिया बीमार है—
यह कोई खबर नहीं,
यह पृष्ठभूमि है।
अख़बार, स्क्रीन, बाज़ार,
तालियाँ, नारे,
सब एक ही ज्वर में काँपते हैं।

हर तरफ़
महत्वाकांक्षा की खाँसी,
ईर्ष्या का बुख़ार,
लालच की उलटी,
और इसे
“सफलता” कहा जाता है।

जो तुम देखते हो,
वही तुम बनते हो।
जो तुम्हारा समय खाता है,
वही तुम्हें निगलता है।
जो मन में बैठ जाता है,
वही मालिक हो जाता है।

बीमारी
दरवाज़ा नहीं खटखटाती—
ध्यान के रास्ते
चुपचाप भीतर आ जाती है।

पर सवाल यह नहीं
कि दुनिया कैसी है,
सवाल यह है—
क्या तुम भी वैसे ही रहना चाहते हो?

भीड़ में घुल जाना
आसान है,
पर स्वस्थ रहना
हिम्मत माँगता है।

कभी-कभी
अकेले खड़े होना पड़ता है—
शोर के विरुद्ध,
बहुमत के विरुद्ध,
पूरी व्यवस्था के विरुद्ध।

स्वास्थ्य कोई दान नहीं,
कोई नैतिक पदक नहीं—
यह आत्म-कर्तव्य है।

और जो भीतर से स्वस्थ है,
वह उपदेश नहीं देता,
वह चमकता है।
उससे
चुपचाप
चिकित्सा बहती है।

दुनिया को बचाने नहीं,
ख़ुद को
बीमार न होने देने के लिए—
यही जीवन का अर्थ है।

ChatGPT can make mistakes. Ch
Scroll to Top