मिट्टी खोदो, हीरा वहीं है

मिट्टी खोदो, हीरा वहीं है

तुम जहाँ हो,
वहीं से
रास्ता खुलेगा।

किसी नए स्थान,
किसी नए व्यक्ति,
किसी नई परिस्थिति की
ज़रूरत नहीं।

जो सामने है—
उसी से
शुरुआत करो।

यदि ऊब है,
तो ऊब से भागो मत।
उसे देखो।
उसी में
प्रवेश-द्वार छुपा है।

यदि आसक्ति है,
तो उसे न ढको,
न उचित ठहराओ।
वह तुम्हें दिखाएगी
तुम्हारी निर्भरता,
तुम्हारा भ्रम।

यदि क्रोध है
या भय—
तो वही
मार्ग है।

उन्हें दबाने की
कोशिश मत करो।
उनके भीतर
जाओ।

वे
तुम्हारे झूठे “मैं” की
संरचना खोलेंगे—
उसकी आदतें,
उसकी सीमाएँ।

जो भी तुम हो,
जैसे भी हो—
वहीं से
शुरू करो।

किसी आदर्श स्थिति का
इंतज़ार मत करो।
किसी शांत समय की
प्रतीक्षा मत रखो।

जहाँ दर्द है,
जहाँ उलझन है,
जहाँ असुविधा है—
वहीं
खुदाई करो।

ऊपरी सतह
मत चमकाओ।
मिट्टी को
सुंदर दिखाने का
प्रयास मत करो।

परतें चीरनी होंगी।
तभी
गहराई खुलेगी।

मिट्टी
शत्रु नहीं है।

वही
नक्शा है।

उसी में
संस्कार हैं,
उसी में
मन की दिशा छुपी है।

जिससे तुम
अब तक
बचते रहे—
वही
तुम्हें
तुम तक
ले जाएगा।

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