मैं तृप्त हूँ या नहीं—किसे परवाह है!
अशांति है—
अशांति है—
अशांति है।
फिर
एक दिन
साहस करके
मैंने
अशांति को देखा।
वहाँ
कुछ महान नहीं था।
बस
छोटी-छोटी माँगें,
नाज़ुक इच्छाएँ,
अहम् की
थकी हुई पुकार।
और उसी क्षण
अशांति की
सेवा करने की
ज़रूरत खत्म हो गई।
जब
खुद की बेचैनी
केंद्र नहीं रहती,
तो
कुछ बड़ा
जगह लेने लगता है।
कोई कारण,
कोई काम,
कोई सत्य—
जो
इतना ध्यान माँगता है
कि
अपने बारे में
सोचने का
अवकाश ही नहीं बचता।
अब
मैं यह नहीं पूछता—
मैं तृप्त हूँ या नहीं।
मैं कहता हूँ—
हो सकता है
मैं अधूरा रह जाऊँ।
हो सकता है
मैं दुखी रहूँ।
हो सकता है
मैं खुश रहूँ।
ठीक है।
जिसे मैंने
समर्पित किया है,
वह
मेरी छोटी खुशी-उदासी से
कहीं बड़ा है।
दर्द है?
शायद।
पर
मैं भूल गया
उसकी गिनती करना।
यह
पलायन नहीं।
यह
पार जाना है।
या
इसे प्रेम कह लो।
क्या मेरी समस्याएँ
खत्म हो गईं?
नहीं।
क्या मैं
व्यक्तिगत रूप से
संतुष्ट हूँ?
शायद नहीं।
पर
किसे परवाह है!
मेरे पास
ध्यान देने के लिए
कुछ बेहतर है।
यही
तृप्ति है।
जब
तुम्हारी व्यक्तिगत सफलता
महत्व खो देती है,
और तुम कह पाते हो—
मेरे “मैं” से
कुछ अधिक जरूरी है—
तभी
तुम सच में
सफल होते हो।





