रिक्तता की प्रतिध्वनियाँ
अधूरा मन
अधूरे मन से
पूर्णता माँगता है—
जैसे
दो भिखारी
एक-दूसरे से
अरबपति बनने की
आशा करें।
यह आशा
कभी पूरी नहीं होती।
जब तुम सोचते हो—
कोई आएगा
जो मन को शांति देगा,
घर को पवित्रता,
तो तुम
निराशा को
आमंत्रण दे रहे होते हो।
देखो उन युगलों को—
वह सोचती है
वह उसे मजबूती देगा,
जीवन का आधार बनेगा।
पर वह
न शरीर से सीधा है,
न चेतना से।
वह हैरान होती है—
मैंने स्तंभ चाहा था,
यह तो
खड़ा भी नहीं रह पाता।
और यहीं से
शुरू होता है
वह नाटक
जिसे दुनिया
विवाह कहती है।
उसे भूख है,
उसके पास अंडे नहीं।
उसे बात करनी है,
उसे चुप्पी चाहिए।
वह गहराई ढूँढती है,
वह
भटकाव।
किसी के पास
वह नहीं
जो दूसरे को चाहिए।
वे अधूरे आए थे,
और
एक-दूसरे में
पूर्णता खोजते रहे।
खोखले भीतर,
वे
एक-दूसरे की
रिक्तता को
गूँजाते रहे।
यही होता है
जब मुक्ति
दूसरे से
माँगी जाती है।
जो स्वयं
भटका है,
वह
दिशा कैसे देगा?
जब तक
दीपक
अंदर नहीं जलता,
घर में
प्रकाश नहीं उतरता।
जब तक
तुम
भीतर के पथ पर
चलना नहीं सीखते,
कोई साथी
शांति नहीं दे सकता।
इसके बिना
यह प्रेम नहीं—
यह
उलझन का सौदा है,
निराशा का
शांत
तमाशा।





