स्पष्टता विकल्प नहीं छोड़ती
(Clarity Leaves No Alternatives)
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता)
जब स्पष्टता होती है,
तो चुनाव
एक बोझ नहीं रहता।
सोचो—
अगर तुम जानते हो
कि तुम कौन हो,
तुम्हें क्या चाहिए,
तो क्या
फिर भी
उलझन बचती है?
फिर यह
घुमावदार सोच क्यों?
यह चक्करदार प्रश्न क्यों?
इतने विकल्प
आख़िर आते कहाँ से हैं?
विकल्प
तथ्यों में नहीं होते—
तथ्य तो
एक होते हैं,
निर्विवाद,
सीधे।
तथ्यों का
कोई विकल्प नहीं होता।
फिर भी
हम रास्तों की भीड़ देखते हैं,
क्योंकि
भीतर
हम एक नहीं हैं।
मैं
कई टुकड़ों में बँटा हूँ—
कई इच्छाएँ,
कई डर,
कई अधूरे “मैं”।
और यह
भीतरी बिखराव
बाहर
विकल्पों की भीड़ बन जाता है।
एक मन,
कई दिशाएँ—
और हर दिशा
दूसरी से लड़ती हुई।
इसलिए
जब बाहर सब
धुँधला लगे,
तो बाहर मत भागो।
थोड़ी देर
स्थितियों को छोड़ो,
और भीतर पूछो—
क्या मैं
डर से देख रहा हूँ?
या चाह से?
या फिर
ईमानदारी से,
निस्पृह होकर?
जैसे ही
देखने का केंद्र बदलता है,
कोहरा
अपने आप छँट जाता है।
तथ्य
नंगे खड़े हो जाते हैं—
न विकल्प,
न चुनाव,
न भ्रम।
निर्णय
किया नहीं जाता—
वह
दिख जाता है।
अंधे को आँख देना
प्रशंसनीय है,
पर
देखती आँखों को
दृष्टि देना—
वह
जादू है।
और यही
वह जादू है
जिसकी
हमें सच में ज़रूरत है।
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