स्वयं को पराजित करो

स्वयं को पराजित करो

सबसे बड़ा युद्ध
किसी और से नहीं—
अपने ही भीतर है।

इच्छाएँ हैं,
हितों पर खतरे हैं,
जीवन
लगातार चुनौती है—
और हाँ,
उसी में आनंद भी छिपा है।

हम हारते हैं
और चकित रह जाते हैं—
मैं क्यों नहीं जीत पा रहा?
क्यों हर बार
खुद से ही
पीछे रह जाता हूँ?

ध्यान से देखो—
हार बाहर से नहीं आती।
वह भीतर जन्म लेती है—
अविवेक से,
ढीले संकल्प से।

शरीर पुराना है,
आदिम है—
हार्मोन,रसायन, आवेग
हमें हाँकते हैं
जानवरों की तरह।
और हम
आज्ञा मान लेते हैं।
यहीं
पहली हार होती है।

ऊपर से
संस्कार,धर्म, शिक्षा,मीडिया—
कहानी पर कहानी
हमारे भीतर
भर दी जाती है।

हम सोचते हैं
हम चुन रहे हैं—
पर असल में
हम चलाए जा रहे हैं।
जब तक दुश्मन को
बाहर ढूँढते रहोगे,
युद्ध गलत दिशा में रहेगा।

देखो—
मन एक मशीन है,
शरीर एक प्रोग्राम।
यह समझ
कोई हार नहीं—
यही शुरुआत है।

जिस दिन
तुमने देख लिया
कि तुम कैसे चलाए जाते हो,
उसी दिन
आज्ञाकारिता टूटने लगती है।
और वही विजय है।

खुद को हराओ—
अपने आवेगों को,
अपने अंधे संस्कारों को।
बाक़ी सब
अपने आप झुक जाएगा।

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