गुरु गोविन्दसिंह — मनीभाई नवरत्न
एक ओर शत्रुओं को तलवार से ललकारने वाला,
दूसरी ओर कलम से काव्य के मोती बीनने वाला,
हाथ पर बाज और हृदय में करुणा छिपाए,
धर्म, मानवता और राष्ट्रधर्म के लिए
अथक खड़े रहने वाला—
वह विलक्षण पुरुष थे गुरु गोविन्दसिंह।

पटना की धरती पर
23 दिसम्बर 1666 को जन्मे
एक प्रकाश…
जो आगे चलकर
भय और अन्याय के अँधेरे को
अपनी तेजस्विता से चीर देगा।
गूजरी माता की गोद
और गुरु तेगबहादुर का तप—
दोनों ने एक असाधारण आत्मा को आकार दिया।
चाँदनी चौक के फव्वारे के सामने
जब पिता का सिर कटकर गिरा,
तो इतिहास थर्रा उठा—
पर नन्हे गोविन्दराय के मन में
दुःख की अग्नि ने
धर्म की मशाल जगा दी।
वह जानते थे कि
अन्याय के सामने मौन भी अपराध है।
वे बढ़े—
और अधर्म ने मार्ग रोका।
औरंगजेब की कठोर नीति,
पहाड़ी राजाओं की ईर्षा,
आनन्दपुर की घेराबंदी…
चमकौर का रण
जहाँ दो पुत्र वीरगति को प्राप्त हुए।
सरहिंद की दीवारें
जहाँ छोटे साहिबज़ादों का बलिदान
इतिहास में पत्थर की तरह
अजर-अमर हो गया।
गुरु के भीतर एक दीप था
जो टूटता नहीं,
जो अंधकार से लड़ना ही जानता था।
वह केवल रणभूमि के शूरवीर नहीं थे,
बल्कि शब्दों के सम्राट भी।
कवित्व उनके भीतर
धारदार तलवार की तरह चमकता था।
ब्रज, फारसी, पंजाबी—
जिस भाषा को छुआ,
उसे तेजस्विता से भर दिया।
उनकी कलम में रोष भी था,
भक्ति भी,
और एक पिता की वेदना भी।
‘विचित्र नाटक’ में
उन्होंने अपना हृदय उँडेला।
‘चण्डीचरित्र’, ‘चौबीस अवतार’,
‘जफरनामा’ और ‘दशम ग्रंथ’—
ये केवल ग्रंथ नहीं,
जागृति के शंखनाद थे।
साहित्य उनके हाथों में
संघर्ष का शस्त्र बन गया।
वे सपूत थे—
धरा के, धर्म के, मानवता के।
उनकी खालसा-स्थापना
सामाजिक साहस की घोषणा थी कि
मनुष्य जाति से बड़ा
कोई जाति नहीं।
वे पुत्र थे इस भारतमाता के
जिसकी रक्षा के लिए
उन्होंने अपना सर्वस्व दे दिया—
पुत्र, मातृ, राज्य, विश्राम—
सब।
नांदेड़ में जब
घावों के टांके खुल गए,
तो भी उनका तेज
मांझा नहीं।
गुरुग्रंथ साहिब का पाठ करते हुए
उन्होंने संसार को विदा कहा—
पर स्वयं चले नहीं,
अमर हो गए।
उनका जीवन
वीरता का स्तंभ है,
त्याग का प्रकाश है,
और भारत की आत्मा में
आज भी एक ऊँची तरंग की तरह गूँजता है।
गुरु गोविन्दसिंह—
एक नाम नहीं,
एक शौर्य-गीत है,
जो पीढ़ियों को बताता है कि
धर्म की रक्षा के लिए
बलिदान ही मनुष्य को
अमर बनाता है।
— मनीभाई नवरत्न





