पूर्णता नहीं, निरंतरता

पूर्णता नहीं, निरंतरता

पूर्ण होना लक्ष्य नहीं,
खड़ा रहना लक्ष्य है।
गिरकर भी
पीठ न दिखाना—
यही जीवन है।

लड़ाई शुरू करने से पहले
इतना जान लो—
क्या मूल्यवान है,
और किसके लिए
तुम हार स्वीकार नहीं करोगे।

सौ बार गिरो,
सही दिशा में गिरो।
कीमत चुकानी पड़े—
तो चुकाओ।
गहराई सस्ती नहीं होती।

आसानी मत माँगो।
तालियाँ मत चाहो।
ईमानदारी का रास्ता
आराम के लिए नहीं होता।

जब वार लग चुका हो—
चलते रहो।
जब अंकतालिका
तुम्हारे खिलाफ हो—
चलते रहो।
जब दुनिया कहे—
“अब खत्म”—
तब भी चलते रहो।

ताकत खत्म हो जाए—
तब लड़ो।
कारण मूर्ख लगे—
तब लड़ो।
जब कोई साथ न हो—
तब लड़ो।
जब स्मृति भी
तुम्हें छोड़ दे—
तब लड़ो।

खुद पर तरस मत खाओ।
अपराधबोध में मत डूबो।
यह मत कहो—
“मैं असफल हो गया,
मैंने धोखा दे दिया।”

नहीं।
तुमने उस क्षण
जितना हो सका, किया।

अब
जो शेष है,
वही करो।

यही सार है—
निरंतरता।

न चमक,
न सिद्धि,
न परिपूर्णता।

बस
शांत,
विनम्र,
अडिग
निरंतरता।

दुनिया जश्न मनाए,
उन्हें लगे
लड़ाई खत्म हो गई—
कोई बात नहीं।

जब तक तुमने
अंदर से हार नहीं मानी,
तब तक
वे जीते नहीं।

क्योंकि यह युद्ध
जीत का नहीं,
सही से
मुँह न मोड़ने का है।
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