लड़ने योग्य युद्ध
सच मानो—
ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा
हमने
फालतू लड़ाइयों में
गँवा दिया।
ऐसी चीज़ों पर
जिन्हें हारने का
कोई अर्थ नहीं था,
और जीतने का
कोई मूल्य नहीं।
इसलिए
न साहस जगा,
न संकल्प,
न भीतर की
कोई शक्ति।
फिर
अचानक
एक असली युद्ध सामने आता है—
भारी,
अर्थपूर्ण,
डराने वाला।
यही
अनुग्रह है।
अनुग्रह
आराम बनकर नहीं आता,
वह
चुनौती बनकर आता है।
पुराना तुम
कमज़ोर है,
भागना चाहता है—
“क्यों मुसीबत मोल लूँ?”
“क्यों यह बोझ उठाऊँ?”
आवाज़ें आएँगी—
आदतें लौटेंगी—
लालच बुलाएँगे—
पीछे हट जा।
लेकिन
यहीं रुकना है।
यहीं टिकना है।
यह युद्ध
छोड़ने के लिए नहीं,
खड़े रहने के लिए है।
परिणाम की चिंता मत करो,
बस
पीछे मत हटो।
क्योंकि
जो सही युद्ध चुन ले
और
अंत तक डटा रहे—
वही
पहले ही
जीत चुका होता है।
यही
असली विजय है।
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