अकेलापन
अकेले होने का नाम नहीं,
यह तो भीतर की भीड़ है—
जहाँ लोग नहीं,
अपने ही विचार
कंधे से कंधा मिलाकर
खड़े रहते हैं।
वह व्यक्ति अकेला है
जो अपने साथ
ठीक नहीं है।
उसके भीतर
तुलनाएँ हैं,
इच्छाएँ हैं,
शिकायतें हैं,
यादों का शोर है।
दुनिया भले सामने हो,
पर वह
अपने ही दिमाग में
घिरा हुआ है।
अकेलापन
खाली मेज़ नहीं,
एक भरा हुआ रेस्तराँ है—
जहाँ हर थाली
बासी है,
हर स्वाद
फीका।
कॉफी की मेज़ पर
दो कुर्सियाँ हैं—
एक पर
कल्पनाएँ बैठी हैं,
दूसरी पर
डर।
दोनों के बीच
खुद से ही
थकी हुई बातचीत चल रही है।
इतनी तेज़
कि
आसमान दिखाई नहीं देता,
कॉफी का स्वाद
महसूस नहीं होता।
पूरा ब्रह्मांड
आमंत्रण देता है—
रंग, धूप, हवा, लोग—
पर तुम
दरवाज़ा नहीं खोलते,
क्योंकि
दुनिया तुम्हारी
उम्मीदों के अनुसार
चल नहीं रही।
तुम
जो है
उसे स्वीकार करने के बजाय
अपने भीतर की
फिल्म से चिपके रहते हो।
और विडंबना यह है—
वह फिल्म
तुम्हें खुद भी
अच्छी नहीं लगती।
इसलिए अकेलापन
दुख देता है।
अकेला व्यक्ति
न दुनिया के साथ है,
न खुद के साथ।
वह
असंतोष के
बीच के इलाके में
रहता है—
जीवन से कटा हुआ,
मन का आदी।
पर
अकेले होना
कुछ और ही है।
अकेले होना
पूरा होना है।
अकेले होना
अंदर की
कमी का न होना है।
अकेलापन
छीनता है,
अकेलापन
माँगता है—
पर अकेलापन नहीं,
अकेलापन नहीं—
अकेलेपन से अलग,
अकेलेपन से परे
अकेलापन नहीं—
अकेलेपन में
संपूर्णता होती है।
अकेलेपन में
तुम दुनिया से
कुछ लेने नहीं जाते,
बस
मिलने जाते हो।
और शायद
यही मिलना
जीवन की
सबसे सच्ची संगति है।





