उनकी तड़प तुम्हारी ही है
यदि
तुम्हें याद है
अपनी ही बेड़ियाँ,
अपनी ही मुक्ति की
अधूरी पुकार—
तो
तुम
दूसरों की
खामोश कैद को
महसूस करने लगते हो।
तब
दूसरों की आँखों में
जो चाह
कभी कही नहीं गई,
वह
तुम्हें
चुभने लगती है।
जब तुम
सच में
अपने आप से
प्रेम करते हो,
तो
एक सत्य
उजागर होता है—
तुम्हारी भलाई
और
दुनिया की भलाई
अलग नहीं।
साधारण प्रेम
सौदे जैसा है—
सुख के बदले सुख,
आराम के बदले
आराम।
कभी
रिझाना,
कभी
रिझ जाना।
पर
वास्तविक प्रेम
कुछ और है।
वह
यह स्पष्ट पहचान है
कि
दूसरा
तुम्हारे
जैसा ही है।
और
तुम कौन हो?
तुम
अशांत हो,
तुम
पीड़ित हो,
तुम
एक ऐसी
अपूर्णता ढोते हो
जो
भीतर से
कुतरती रहती है।
अपने आप से
प्रेम करने का अर्थ
यह नहीं
कि
खुद को
बहलाते रहो—
बल्कि
यह है
कि
सत्य दो,
सांत्वना नहीं।
मुक्ति दो,
भटकाव नहीं।
खुद से
इतना प्रेम करो
कि
मामूली को
अस्वीकार कर सको।
क्षणिक से
संतुष्ट न हो।
अपने लिए
सर्वोच्च माँगो।
और
दूसरा
कोई अलग नहीं।
उसके भीतर भी
वही
खालीपन है।
वही
लंबी थकान,
वही
जीवनभर की
पीड़ा।
यह जान लेना
कि
हम
एक ही संकट के
साथी हैं—
यही
प्रेम है।
सर्वोच्च के लिए
तुम्हारा प्रेम
तय करे
कि
तुम
दूसरों से
कैसे मिलते हो।
उनकी सहायता करो
वैसे ही
जैसे
अपनी करते हो।
दया से नहीं,
कर्तव्य से नहीं—
बल्कि
इस गहरी स्मृति से
कि
उनकी कहानी
तुम्हारी कहानी है।
और
उनकी तड़प
तुम्हारी
ही तड़प है।





