बिना समझ के धाराप्रवाह बोलना शोर है

Fluency without Insight Is Noise
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता)

जहाँ शब्द
अज्ञान और इच्छा की हड़बड़ी से निकलते हैं,
वहाँ भीतर
डर छिपा होता है।
उसी डर को ढकने के लिए
हम confidence पहन लेते हैं।

आज की संस्कृति में
बोलना ही योग्यता बन गया है—
जितना तेज़,
जितना आत्मविश्वासी,
उतना ही “काबिल”।

मंच पर खड़ा बच्चा
उँगली उठाए,
सीखी हुई दृढ़ता के साथ—
जैसे सत्य उसकी मुट्ठी में हो।
तालियाँ गूँजती हैं,
विचार नहीं।

हमने
अभिव्यक्ति को
अर्थ का विकल्प बना लिया है।
जहाँ गहराई नहीं,
वहाँ आवाज़ बढ़ा दी जाती है।

फ्लुएंसी बिकती है,
सूझ नहीं।
शब्द चलते हैं,
दृष्टि नहीं।

जो धाराप्रवाह बोले,
वह सुनने योग्य माना जाता है—
भले ही
वह शून्य उछाल रहा हो।

पर जीवन का मूल्य
प्रस्तुति से नहीं,
प्रामाणिकता से तय होता है।

पचानवे प्रतिशत सत्य
उसमें है
जो तुम सच में देख रहे हो,
जी रहे हो,
समझ रहे हो।
बाकी पाँच प्रतिशत—
उच्चारण, मुद्रा, आत्मविश्वास—
सिर्फ सजावट हैं।

गुणवत्ता
ध्यान से जन्म लेती है,
ईमानदारी से पलती है।
जहाँ स्पष्टता होती है,
वहाँ ज़ोर लगाने की ज़रूरत नहीं।

पर बाज़ार को
स्पष्ट लोग नहीं चाहिए—
उसे चाहिए
भटके हुए खरीदार।
इसलिए वह
खोखली अभिव्यक्ति को पुरस्कृत करता है।

तेज़ बोलो,
ऊँचा बोलो,
लगातार बोलो—
और सुंदर दिखो,
तो तुम सफल हो।

अज्ञान
अज्ञान की तालियाँ बजाता है,
जब वह आत्मविश्वास में लिपटा हो।

“वाह, कितना fluent है!”
प्रभावित मत हो जाना।

सोचो—
जिसे तुम सराहते हो,
धीरे-धीरे
वही बनते जाते हो।
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