आप रचनात्मकता नहीं बना सकते
रचनात्मकता बनाई नहीं जाती—
वह घटती है।
जब मन
फालतू बोझ से मुक्त होता है।
तुम उसे पैदा नहीं करते,
तुम बस
दरवाज़ा साफ करते हो।
वह स्वयं आती है,
जहाँ जगह खाली हो।
क्या रोकता है रचना को?
भरा हुआ मन—
चिंताओं से,
लालसाओं से,
परिणामों की भूख से।
जो हर पल पूछता है—
“अंत में क्या मिलेगा?”
वह नया
कभी नहीं रच सकता।
अनिश्चितता से डर
सृजन की हत्या कर देता है।
रचना का अर्थ है—
कुछ ऐसा लाना
जो पहले नहीं था,
जिस पर
अतीत की उँगलियों के निशान न हों।
जिसे हम अक्सर
innovation कहते हैं,
वह बस
पुराने विचारों की
सजावट है।
नवीन नहीं,
सुधार है।
सच्ची रचना
निरुद्देश्य होती है।
हर उद्देश्य
स्मृति से उपजता है—
कल की इच्छा,
आज का लक्ष्य।
उद्देश्य बाँधता है,
और बंधन से
डर जन्म लेता है—
असफलता का,
पीछे रह जाने का।
डर के माहौल में
रचनात्मकता
दम घुटने से पहले ही
मर जाती है।
सच्ची सृजनशीलता को
न प्रशंसा चाहिए,
न प्रमाणपत्र।
उसे चाहिए
भीतरी स्वतंत्रता।
और यह स्वतंत्रता
प्रयास से नहीं मिलती—
यह तब बचती है
जब भीतर का शोर
शांत हो जाता है।
जब मन
कुछ पाने नहीं दौड़ता,
तभी
कुछ नया
उतर आता है।





