No Habit Is a Good Habit
(विचारप्रद, सत्यनिष्ठ, विचारोत्तेजक अतुकांत कविता)
जीवन
आदत और चुनाव के बीच
लगातार खींचतान है—
और अक्सर
आदत जीत जाती है,
क्योंकि वह
चुपचाप चुनाव का
भेष धर लेती है।
आदत का अर्थ सरल है—
दोहराव
और अज्ञान।
तुम करते हो,
पर जानते नहीं क्यों।
एक बटन दबता है,
एक पैटर्न चल पड़ता है—
न प्रश्न,
न चेतना।
बस
एक मृत-प्रतिवर्त।
जिस क्षण
आदत हावी होती है,
तुम मौजूद नहीं रहते।
वहाँ
कोई “मैं” नहीं होता—
सिर्फ
अदृश्य डोरियों से
बंधा कठपुतलीपन।
बाद में
पछतावा आता है,
संकल्प आता है—
पर घटते समय
तुम अनुपस्थित थे।
और फिर भी
लोग गर्व से कहते हैं—
“मेरी अच्छी आदत है।”
किसी के लिए
मांस न खाना
अच्छी आदत है,
किसी और के लिए
त्योहार पर
जानवर काटना भी।
कर्म वही,
नारे अलग।
अंधापन वही।
क्या सच में
तुम जानते हो
तुम क्यों नहीं खाते?
या क्यों खाते हो?
या बस
वही दोहरा रहे हो
जो सोचने से पहले
दिमाग में भर दिया गया था?
जो कभी
जाँचा ही नहीं गया,
उसे रोज़ दोहराना—
यही आदत है।
क्या कोई
अचेतन कर्म
अच्छा हो सकता है?
“अच्छी आदत”
कह देना
अज्ञान पर
इत्र छिड़कना है।
यह देखो—
बिना झिझक।
कोई भी आदत
निर्दोष नहीं।
आदत
बुद्धि की
मौन हत्यारी है।
वह तुम्हें
यांत्रिक,
अनुमेय,
सुस्त बना देती है।
जहाँ
समझ आती है,
वहाँ
आदत गल जाती है।
जहाँ
स्पष्टता होती है,
वहाँ
कोई पैटर्न
राज नहीं कर पाता।
इसलिए
निर्मम ध्यान रखो।
छोटे में भी,
बड़े में भी।
और पूछो—
क्या मैं यह
पूरी तरह जीवित होकर कर रहा हूँ,
या
आदत की नींद में
आधा मर चुका हूँ?





